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New Delhi: भारत में शहरीकरण का दायरा अब पारंपरिक प्रशासनिक सीमाओं को लांघ चुका है। देश के अनगिनत क्षेत्र कागजों पर भले ही आज भी गांव दर्ज हों, लेकिन धरातल पर वे पूरी तरह शहरों में बदल चुके हैं। इन इलाकों में खेती पर निर्भरता बेहद कम हुई है, कंक्रीट का दायरा बढ़ गया है और यातायात का आधुनिक नेटवर्क तैयार हो चुका है। इस जमीनी बदलाव को देखकर केंद्र सरकार अब केवल शहरी और ग्रामीण के पुराने वर्गीकरण से आगे बढ़कर एक तीसरी नई श्रेणी ‘फंक्शनल अर्बन सेटलमेंट्स’ (कार्यात्मक शहरी बस्तियां) बनाने पर विचार कर रही है।
आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत कार्यरत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स (NIUA) की ताजा रिपोर्ट में नए ‘नेशनल सेटलमेंट क्लासिफिकेशन फ्रेमवर्क’ की सिफारिश की गई है। इस अध्ययन को प्रधानमंत्री मोदी के प्रधान सचिव पीके मिश्रा द्वारा जारी किया गया है। वर्तमान में भारत में शहरीकरण को केवल जनगणना कस्बों (Census Towns) और वैधानिक कस्बों (Statutory Towns) के चश्मे से देखा जाता है, जो वास्तविक स्थिति को दर्शाने में नाकाफी है।
संयुक्त राष्ट्र के मानकों के आधार पर अनुमानों के मुताबिक, साल 2025 तक भारत की करीब 84 प्रतिशत आबादी शहरी बस्तियों में निवास कर रही थी, जबकि सरकारी कागजों में यह आंकड़ा महज 36 प्रतिशत के आसपास ही सिमटा हुआ है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में इस तरह के सैकड़ों गांव हैं, जो पूरी तरह शहरी सुख-सुविधाओं से लैस हैं, लेकिन उनका प्रशासनिक संचालन आज भी ग्रामीण व्यवस्था (पंचायतों) के तहत हो रहा है।
इस भौगोलिक और प्रशासनिक विसंगति को दूर करने के लिए सरकार उपग्रहों (सैटेलाइट) से प्राप्त ‘नाइट-टाइम लाइट’ यानी रात के समय चमकने वाली रोशनी के डेटा का इस्तेमाल कर रही है, ताकि शहरों के वास्तविक फैलाव का सटीक आकलन किया जा सके। इसके अलावा सरकार टियर-2 से लेकर टियर-5 तक के शहरों के लिए एक समान वर्गीकरण को भी अंतिम रूप दे रही है, जिससे उनके आकार और जरूरत के हिसाब से सही नीतियां, बजट आवंटन और विकास योजनाएं तैयार की जा सकें। सरकार की इस नई पहल से देश के तेजी से बदलते आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य को एक सही और व्यावहारिक दिशा मिलने की उम्मीद है।

