Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने आउटसोर्सिंग कंपनी राइडर सिक्योरिटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड को एक बड़ी राहत दी है। मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक एवं न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी संस्था या कंपनी को प्रतिबंधित करने से पहले उसे स्पष्ट रूप से कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी करना और उसका पक्ष सुनना अनिवार्य है। विधिक प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई ऐसी प्रशासनिक कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के सरासर खिलाफ है।

कारण बताओ नोटिस में नहीं था प्रतिबंध का जिक्र

यह पूरा विवाद याचिका संख्या W.P. (C) No. 1867 of 2023 से जुड़ा है। राइडर सिक्योरिटी सर्विसेज ने ग्रामीण विकास विभाग के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसका टेंडर (अनुबंध) रद्द करने के साथ ही उसे ब्लैकलिस्ट भी कर दिया गया था। अदालत में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि विभाग ने 31 जनवरी 2023 को जो नोटिस दिया था, उसमें केवल अनुबंध समाप्त करने की बात थी। उसमें कहीं भी कंपनी को प्रतिबंधित करने का कोई प्रस्ताव नहीं था। हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक नोटिस में कार्रवाई का साफ उल्लेख न हो, तब तक ऐसी सजा कानूनी रूप से सही नहीं मानी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का दिया हवाला

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि किसी भी फर्म को ब्लैकलिस्ट करना एक बेहद गंभीर प्रशासनिक कदम है, क्योंकि इससे संबंधित कंपनी भविष्य में किसी भी सरकारी निविदा या कांट्रैक्ट में हिस्सा लेने के अधिकार से वंचित हो जाती है। अदालत ने इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के ‘गोरखा सिक्योरिटी सर्विसेज बनाम दिल्ली सरकार’ और ‘कुलजा इंडस्ट्रीज लिमिटेड’ जैसे नजीर बन चुके कई बड़े फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि बिना पूर्व सूचना के ऐसा कड़ा कदम उठाना पूरी तरह गैर-कानूनी है।

हालांकि, अदालत ने कंपनी का अनुबंध समाप्त किए जाने के प्रशासनिक फैसले पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की। कोर्ट ने कहा कि चूंकि अनुबंध की तय अवधि पहले ही खत्म हो चुकी है, इसलिए कंपनी चाहे तो इस मुद्दे पर सक्षम प्राधिकारी या उचित विधिक मंच के समक्ष अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल कर सकती है। अंत में, हाईकोर्ट ने सरकार की त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया के कारण प्रतिबंध के आदेश को निरस्त करते हुए इस याचिका का पूरी तरह निस्तारण कर दिया।

Share.
Exit mobile version