Lifestyle Desk: आज के इस हाईटेक और आधुनिक दौर में बच्चों का अधिकांश समय स्मार्टफोन, स्मार्ट टीवी और ऑनलाइन डिजिटल गेम्स की स्क्रीन पर बीत रहा है। इस ‘डिजिटल स्क्रीन टाइम’ का सीधा और गहरा नकारात्मक असर बच्चों के मानसिक व्यवहार, एकाग्रता और उनकी सामाजिक आदतों पर साफ देखने को मिल रहा है। इस चुनौतीपूर्ण समय में माता-पिता (Parents) की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा संवेदनशील और महत्वपूर्ण हो गई है। पैरेंटिंग एक्सपर्ट्स का मानना है कि बच्चे का पहला विद्यालय उसका घर और उसके पहले शिक्षक उसके माता-पिता ही होते हैं। अगर बचपन से ही बच्चों को सही समय पर सही दिशा, मैनर्स (Good Manners) और जीवन-मूल्य सिखाए जाएं, तो उनका व्यक्तित्व बेहद मजबूत बनता है।
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डिजिटल पैरेंटिंग (Digital Parenting) के इस दौर में उम्र के विभिन्न पड़ावों पर बच्चों को क्या और कैसे सिखाया जाए, इसकी एक सटीक गाइडलाइन नीचे दी गई है:
1. अर्ली स्टेज (1 से 2 साल की उम्र): देखकर सीखने का दौर- इस शुरुआती उम्र में बच्चे बहुत तेजी से चीजों को कैच करते हैं। वे जो देखते हैं, वही सीखते हैं।
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क्या करें: इस समय उन्हें बुनियादी मैनर्स जैसे- प्यार से बात करना और इशारों में अपनी बात समझाना सिखाएं।
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स्मार्ट टिप: बच्चे इस उम्र में माता-पिता की नकल करते हैं, इसलिए बच्चों के सामने खुद मोबाइल का इस्तेमाल कम करें और खेल-खेल में या खिलौनों के माध्यम से शब्दों को दोहराकर उन्हें बोलना सिखाएं।
2. प्री-स्कूल स्टेज (3 से 5 साल की उम्र): जिद और आदतों का संतुलन– इस उम्र में बच्चे समझने तो लगते हैं, लेकिन उनके भीतर जिद (Stubbornness) की भावना भी बढ़ने लगती है। इस नाजुक दौर में डांटने के बजाय बेहद धैर्य से काम लेने की जरूरत होती है।
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क्या करें: बच्चों में ‘शेयरिंग’ यानी अपनी चीजें साझा करने की आदत डालें ताकि उनमें सहयोग की भावना आए। दूसरों से मिलने पर ‘Hi/Hello’ और विदा लेते समय ‘Bye’ कहना सिखाएं।
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स्मार्ट टिप: उन्हें दूसरों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए पंचतंत्र या नैतिक मूल्यों वाली छोटी कहानियों का सहारा लें। जब भी बच्चा कोई अच्छा काम करे, तो सबके सामने उसकी तारीफ जरूर करें।
3. स्कूल स्टेज (6 से 10 साल की उम्र): सही और गलत की पहचान- इस उम्र के पड़ाव पर आते-आते बच्चों का सामाजिक दायरा बढ़ता है और उनमें सही-गलत को समझने का लॉजिक विकसित होने लगता है।
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क्या करें: बच्चों में हमेशा सच बोलने की आदत डालें और ईमानदारी का महत्व समझाएं। उन्हें टीमवर्क (Teamwork) और मिल-जुलकर रहने की भावना सिखाएं ताकि वे सामाजिक रूप से मजबूत बन सकें।
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स्मार्ट टिप: बच्चों को घर के छोटे-मोटे काम या जिम्मेदारियां सौंपें। यदि उनसे कोई गलती होती है, तो चिल्लाने के बजाय अकेले में शांत तरीके से समझाएं। उन्हें आउटडोर गेम्स (मैदान के खेल) और सामूहिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रेरित करें।
डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox) है सबसे जरूरी
पैरेंटिंग का सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि माता-पिता बच्चों के ‘स्क्रीन टाइम’ (Screen Time) को कड़ाई से सीमित करें। मोबाइल और टीवी पर अत्यधिक समय बिताने से बच्चों के शारीरिक विकास और आंखों पर बुरा असर पड़ता है। उन्हें स्क्रीन से दूर रखने के लिए खुद उनके साथ समय बिताएं, उनके साथ इंडोर या आउटडोर खेल खेलें और उनकी रचनात्मकता (Creativity) को बढ़ावा दें। इस उम्र में दी गई सीख जीवनभर उनका साथ निभाएगी।
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