World News: यूरोपीय देश डेनमार्क एक बार फिर अपने सख्त सामाजिक कानूनों को लेकर चर्चा में है। डेनमार्क सरकार अब देश के सभी स्कूलों और विश्वविद्यालयों में बुर्का, नकाब और चेहरा ढकने वाले हर तरह के इस्लामी पहनावे पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर चुकी है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि यदि शिक्षा लेनी है, तो चेहरा दिखाना अनिवार्य होगा। इसके लिए बकायदा एक विधेयक तैयार किया गया है, जिसे फरवरी 2026 में संसद में पेश किया जाएगा।

कक्षाओं में चेहरा ढकने की जगह नहीं: रासमस स्टोकलुंड

डेनमार्क के प्रवासन और एकीकरण मंत्री रासमस स्टोकलुंड ने इस कदम का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर पहले से ही बैन लागू है, अब इसे शैक्षणिक संस्थानों तक बढ़ाना एक स्वाभाविक कदम है। सरकार का तर्क है कि चेहरा ढकने से शिक्षकों और छात्रों के बीच संवाद में बाधा आती है। इसके साथ ही, प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने संकेत दिए हैं कि स्कूलों से धार्मिक प्रार्थना कक्षों को हटाने और हिजाब पर भी पाबंदी लगाने पर विचार किया जा रहा है।

आजादी या दबाव? बहस ने पकड़ा जोर

इस फैसले के बाद डेनमार्क में वैचारिक जंग छिड़ गई है। जहां एक ओर मानवाधिकार संगठन और इस्लामिक समूह इसे धार्मिक स्वतंत्रता का हनन बता रहे हैं, वहीं सरकार का कहना है कि यह कानून प्रवासी महिलाओं को ‘सम्मान-आधारित’ सामाजिक दबाव से मुक्त करेगा। सरकार इसे सामाजिक समावेश (Social Integration) को बढ़ावा देने वाला कदम बता रही है। गौरतलब है कि अगस्त 2018 से ही वहां सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकना प्रतिबंधित है, लेकिन नए कानून से शैक्षणिक संस्थानों का माहौल पूरी तरह बदलने वाला है।

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