New Delhi: चीन इन दिनों तिब्बत में एक बेहद खतरनाक और गहरी साजिश को अंजाम दे रहा है, जिसका सीधा मकसद तिब्बती संस्कृति, भाषा और वहां की प्राचीन पहचान को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद करना है। ड्रैगन की इस क्रूर रणनीति का मुख्य निशाना मासूम बच्चे हैं। कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने अपने हालिया लेख में तिब्बत के इस खौफनाक सांस्कृतिक नरसंहार का पर्दाफाश किया है। इस भयावह स्थिति की कल्पना शायद 67 साल पहले भारत शरण लेने आए बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने भी कभी नहीं की होगी।
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10 लाख मासूम बच्चों को बोर्डिंग स्कूलों में किया कैद
ब्रह्मा चेलानी के सनसनीखेज खुलासे के मुताबिक, पिछले एक दशक में चीन ने करीब 10 लाख से अधिक तिब्बती बच्चों को जबरन उनके माता-पिता से अलग कर सरकारी बोर्डिंग स्कूलों में ठूंस दिया है। इनमें से अधिकांश बच्चों की उम्र महज चार या पांच साल से भी कम है। चीन भले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन स्कूलों को आधुनिक विकास का मॉडल बताता हो, लेकिन हकीकत में ये बच्चों पर चीनी सभ्यता थोपने के क्रूर कारखाने हैं। इन मासूमों को सिखाया जा रहा है कि तिब्बती संस्कृति पूरी तरह पिछड़ चुकी है और उनकी असल पहचान सिर्फ चीन से है, जो सीधे तौर पर एक सुनियोजित सांस्कृतिक नरसंहार है।
तिब्बत का नाम बदलकर ‘शिज़ांग’ कर रहा ड्रैगन
यह पूरी चाल सिर्फ तिब्बतियों को दबाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे चीन का बड़ा भू-राजनीतिक खेल छिपा है। चीन अब दुनिया के नक्शे से तिब्बत का नामोनिशान मिटाकर उसकी जगह ‘शिज़ांग’ (Xizang) शब्द को स्थापित करने में जुट गया है। हैरान करने वाली बात यह है कि कुछ पश्चिमी देशों के संग्रहालय भी अब तिब्बत की जगह शिज़ांग लिखने लगे हैं, जिससे चीन की इस अवैध नीति को वैश्विक मान्यता मिल रही है।
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एशिया की अधिकांश प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल होने के कारण तिब्बत पर पूर्ण नियंत्रण करके चीन जल प्रवाह पर कब्जा जमाना चाहता है। वह यहां दुनिया का सबसे विशालकाय बांध बना रहा है और प्राकृतिक खनिजों की अंधाधुंध लूट मचा रहा है। चीन की यह विस्तारवादी नीति और सांस्कृतिक नरसंहार न केवल मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है, बल्कि भारत की सुरक्षा और पूरे दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक स्थिरता के लिए भी एक बहुत बड़ा अलार्म है।




