रांची: झारखंड के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग द्वारा प्रस्तावित “Restructuring एवं Clustering System” को लेकर राज्य में सियासी और शैक्षणिक सरगर्मी तेज हो गई है। छात्र संगठन NSUI ने इस नई व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए इसे झारखंड की भाषाई पहचान और गरीब छात्रों के भविष्य पर ‘सीधा हमला’ करार दिया है।
छात्रों की स्वतंत्रता पर अंकुश का आरोप
NSUI झारखंड प्रदेश उपाध्यक्ष अमन अहमद ने मुख्यमंत्री और कुलाधिपति को विरोध-पत्र सौंपते हुए कहा कि सरकार का यह कदम पूरी तरह अव्यावहारिक है। वर्तमान में एक ही कॉलेज में कला, विज्ञान और वाणिज्य (Arts, Science, Commerce) की पढ़ाई होने से छात्रों को विषय चयन की आजादी मिलती है। लेकिन ‘क्लस्टरिंग सिस्टम’ के तहत कॉलेजों को किसी एक विशेष संकाय तक सीमित कर दिया जाएगा। इसका मतलब है कि अगर कोई छात्र विज्ञान के साथ संगीत या इतिहास पढ़ना चाहे, तो उसे अलग-अलग कॉलेजों के चक्कर काटने होंगे।
गरीब और ग्रामीण छात्राओं पर पड़ेगा सबसे बुरा असर
अमन अहमद ने आगाह किया कि इस बदलाव का सबसे ज्यादा नुकसान राज्य के आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्ग के उन छात्रों को होगा जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं। गांवों से आने वाली छात्राओं के लिए अलग-अलग कॉलेजों में जाना न केवल आर्थिक बोझ बढ़ाएगा, बल्कि सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी चुनौतीपूर्ण होगा। परिवहन और आवास के अतिरिक्त खर्च के कारण कई छात्र बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं।
NEP-2020 और क्षेत्रीय भाषाओं का संकट
NSUI का दावा है कि जहाँ केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) ‘बहुविषयी शिक्षा’ (Multidisciplinary Education) की वकालत करती है, वहीं झारखंड सरकार का यह प्रस्ताव कॉलेजों को संकीर्ण दायरों में समेट रहा है। सबसे गंभीर चिंता झारखंड की भाषाई अस्मिता को लेकर है। अमन अहमद के अनुसार, इस व्यवस्था से संताली, हो, मुंडारी, नागपुरी, खोरठा और कुड़माली जैसी जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के विभागों पर अस्तित्व का संकट मंडराने लगेगा।
पदों को ‘सरेंडर’ करने की साजिश?
एक ओर राज्य के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों और कर्मचारियों की भारी कमी है, वहीं दूसरी ओर सरकार पुनर्गठन के नाम पर खाली पदों को समाप्त (Surrender) करने की तैयारी में है। NSUI ने मांग की है कि:
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क्लस्टरिंग सिस्टम से जुड़े सभी आदेशों को तत्काल रद्द किया जाए।
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हर कॉलेज में तीनों संकायों (Arts, Science, Commerce) को पहले की तरह बहाल रखा जाए।
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जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के विभागों को सुरक्षित रखा जाए।
- किसी भी नई व्यवस्था से पूर्व विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं शिक्षाविदों से व्यापक विमर्श किया जाए।
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शिक्षकों के रिक्त पदों पर नियमित नियुक्तियाँ हों।
संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि शिक्षाविदों और छात्रों से विमर्श किए बिना इस व्यवस्था को थोपा गया, तो राज्य भर में उग्र आंदोलन किया जाएगा।



