Jamshedpur: पूर्वी सिंहभूम जिले के गुड़ाबांदा प्रखंड की भालकी पंचायत के नामो लेपो गांव में 40 वर्षीय लुगरी सबर की जिंदगी दर्द, गरीबी और बेबसी की ऐसी कहानी बन चुकी है, जिसे सुनकर किसी का भी दिल भर आए। करीब दस वर्षों से पैरों और कमर के असहनीय दर्द ने उनकी जिंदगी की रफ्तार रोक दी है। वह न ठीक से खड़ी हो पाती हैं और न चल सकती हैं। घर के भीतर एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए उन्हें रेंगकर आगे बढ़ना पड़ता है।
कभी अपने परिवार के काम आने वाली लुगरी आज खुद किसी सहारे की मोहताज हैं। बीमारी ने उन्हें चारदीवारी के भीतर कैद कर दिया है। इलाज कराने की इच्छा तो है, लेकिन परिवार की आर्थिक हालत ऐसी नहीं कि किसी बड़े अस्पताल में उनका इलाज कराया जा सके। पति गुरा सबर जंगल से लकड़ी लाकर किसी तरह घर का चूल्हा जलाते हैं। उनकी आमदनी से परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना ही मुश्किल है।
लुगरी के घर में बच्चों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उनके और गुरा के चार बच्चे हैं। गुरा के भाई की कैंसर से मौत के बाद उसके तीन बच्चे भी इसी परिवार में आकर रहने लगे। अब कुल सात बच्चों के पालन-पोषण का भार परिवार पर है। एक बीमार पत्नी, सात बच्चों की जिम्मेदारी और कमाई का कोई स्थायी साधन नहीं होने के कारण परिवार हर दिन संघर्ष कर रहा है।
मुश्किल यह भी है कि लुगरी को अब तक पेंशन जैसी सरकारी सहायता नहीं मिल सकी है। परिवार को सरकारी राशन मिलने में भी परेशानी होने की बात सामने आई है। ग्रामीणों के अनुसार गुरा सबर के आधार कार्ड में नामो लेपो का पता दर्ज है, लेकिन फिंगरप्रिंट से संबंधित रिकॉर्ड किसी दूसरे सबर व्यक्ति से जुड़ा होने के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में अड़चन आ रही है। कागजी और तकनीकी उलझनों के बीच यह गरीब परिवार सरकारी मदद से दूर होता चला गया।
लुगरी की स्थिति की जानकारी मिलने के बाद भालकी पंचायत की पंचायत समिति सदस्य सरस्वती हेम्ब्रम ने मामले को गंभीरता से लिया है। उन्होंने गुड़ाबांदा के बीडीओ से बातचीत कर लुगरी और उनके परिवार को पेंशन, राशन तथा अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की पहल की है। हालांकि लुगरी की सबसे बड़ी जरूरत आज भी इलाज है, ताकि वह वर्षों से चली आ रही इस पीड़ा से बाहर निकल सकें।
आज लुगरी की आंखें किसी सरकारी कागज या योजना की नहीं, बल्कि अपने उद्धारकर्ता भगवान का इंतजार कर रही हैं। उन्हें उम्मीद है कि कोई ऐसा व्यक्ति उनके जीवन में आएगा, जो उनकी पीड़ा को समझेगा, उनका इलाज कराएगा और उनके परिवार को इस मुश्किल दौर से बाहर निकलने में सहारा देगा। दस वर्षों से रेंग रही लुगरी के लिए किसी मददगार का हाथ शायद सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि दोबारा जिंदगी जीने की उम्मीद बन सकता है।
नामो लेपो की यह कहानी उन सवालों को भी सामने लाती है, जो ग्रामीण इलाकों में रहने वाले गरीब और असहाय परिवारों की जिंदगी से जुड़े हैं। नक्सलवाद के दौर से बाहर निकल चुके इलाके में यदि एक बीमार महिला वर्षों से इलाज और सरकारी सहायता के इंतजार में रेंगकर जिंदगी गुजार रही है, तो विकास की पहुंच पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
लुगरी आज भी उसी उम्मीद में हैं कि कोई आएगा, उनकी बीमारी को समझेगा, इलाज का रास्ता खोलेगा और उनके परिवार का हाथ थामेगा। उनके लिए वह मददगार किसी फरिश्ते से कम नहीं होगा, जिसका इंतजार उनकी जिंदगी पिछले दस वर्षों से कर रही है।




