New Delhi: देश में होने वाले आगामी राज्यसभा चुनावों के मद्देनजर, कांग्रेस पार्टी कर्नाटक में एक बेहद खास और रणनीतिक चक्रव्यूह तैयार कर रही है। कर्नाटक राज्य की कुल चार राज्यसभा सीटों में से तीन पर कांग्रेस की जीत पूरी तरह तय मानी जा रही है। ऐसे में मजबूत स्थिति का फायदा उठाते हुए पार्टी हाईकमान (केंद्रीय नेतृत्व) स्थानीय नेताओं के बजाय राज्य के बाहर के किसी बेहद सक्रिय और कद्दावर राष्ट्रीय नेता को उच्च सदन (पार्लियामेंट) भेजने का बड़ा दांव चल सकता है।
इन तीन बड़े चेहरों के नामों पर शीर्ष स्तर पर मंथन
राजनीतिक गलियारों की रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस के तीन सबसे मुखर और बड़े नेता—वाईएस शर्मिला, सुप्रिया श्रीनेत और पवन खेड़ा—इस वक्त कर्नाटक की राज्यसभा सीट के जरिए संसद पहुंचने के लिए पार्टी नेतृत्व के सीधे संपर्क में हैं:
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वाईएस शर्मिला (YS Sharmila): दावेदारों की इस सूची में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की राजनीति का बड़ा चेहरा वाईएस शर्मिला का नाम सबसे आगे चल रहा है। शर्मिला ने साल 2024 की शुरुआत में अपनी पार्टी ‘वाईएसआर तेलंगाना पार्टी’ का कांग्रेस में औपचारिक विलय किया था। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी की मौजूदगी में पार्टी का दामन थामने के बाद से ही उन्हें एक बेहद मजबूत और स्वाभाविक दावेदार माना जा रहा है।
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सुप्रिया श्रीनेत (Supriya Shrinate): दूसरी प्रमुख दावेदार सुप्रिया श्रीनेत हैं, जो अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की सोशल मीडिया और डिजिटल कम्युनिकेशन की चेयरमैन हैं। सुप्रिया अपनी बेबाक, आक्रामक और मुखर राजनीतिक शैली के लिए जानी जाती हैं और टीवी डिबेट्स से लेकर सोशल मीडिया तक भारतीय जनता पार्टी (BJP) के खिलाफ फ्रंट फुट पर पार्टी का पक्ष रखती रही हैं।
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पवन खेड़ा (Pawan Khera): तीसरा बड़ा नाम कांग्रेस के मीडिया और पब्लिसिटी विभाग के चेयरमैन पवन खेड़ा का है। पवन खेड़ा लगातार विभिन्न राजनीतिक मुद्दों, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से जुड़े मामलों और नीट (NEET) पेपर लीक जैसे राष्ट्रीय विवादों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखे हमलों के कारण लगातार राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में बने हुए हैं।
कर्नाटक का पुराना राजनीतिक इतिहास
कर्नाटक से राज्य के बाहर के गैर-स्थानीय नेताओं को राज्यसभा भेजने का इतिहास काफी पुराना रहा है। अभी हाल ही में साल 2024 के राज्यसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस ने दिल्ली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अजय माकन को कर्नाटक के कोटे से उच्च सदन भेजा था। ठीक इसी तरह, मुख्य विपक्षी दल भाजपा (BJP) भी केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जैसे गैर-कनाडाई और बाहरी नेताओं को इसी राज्य के जरिए राज्यसभा भेजती आई है। अब इस रणनीति को अंतिम रूप देने के लिए मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार जल्द ही नई दिल्ली में केंद्रीय आलाकमान के साथ एक हाई-लेवल मीटिंग करने वाले हैं।
अंदरूनी खींचतान और क्षेत्रीय संतुलन की चुनौती
इस बीच, कांग्रेस के भीतर ही कुछ वरिष्ठ नेताओं का एक धड़ा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को खुद राज्यसभा भेजने के पक्ष में है, हालांकि सिद्धारमैया ने साफ कर दिया है कि वे फिलहाल राज्य की सक्रिय राजनीति में ही बने रहना चाहते हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के भी कर्नाटक से फिर से राज्यसभा चुनाव लड़ने की पूरी उम्मीद है।
इन सबके अलावा, यदि कांग्रेस पार्टी कर्नाटक के सबसे प्रभावशाली ‘वीरशैव-लिंगायत’ समुदाय को साधने के लिए किसी को उम्मीदवार बनाती है, तो पार्टी के महासचिव बसवराजु एपी एक बेहद मजबूत और इकलौते दावेदार बनकर उभरेंगे, क्योंकि पिछले 25 सालों में इस समाज से कोई भी कांग्रेस नेता राज्यसभा नहीं पहुंचा है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद का विधान परिषद (MLC) का कार्यकाल भी इसी महीने समाप्त हो रहा है और उनके नाम पर भी मंथन चल रहा है, हालांकि सूत्रों का कहना है कि वे एमएलसी के रूप में एक और कार्यकाल या राज्य सरकार में मंत्री पद के ज्यादा इच्छुक हैं।
गौरतलब है कि इसी दौरान विधानसभा निर्वाचक मंडल की सात विधान परिषद (MLC) सीटों के लिए भी चुनाव होने वाले हैं, जहाँ सत्ता में होने के कारण कांग्रेस आसानी से चार सीटें जीत सकती है। यही वजह है कि राज्य के कई स्थानीय नेता दिल्ली जाने के बजाय कर्नाटक की राजनीति में एमएलसी बनकर दबदबा बनाए रखने को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं।



