Bokaro: झारखंड में नगर निकाय चुनाव भले ही दलीय आधार पर नहीं हो रहे हों, लेकिन चास नगर निगम के मेयर चुनाव में सियासी दांव-पेच किसी विधानसभा या लोकसभा चुनाव से कम नहीं दिख रहे। पिछले दिनों राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी द्वारा बोकारो के मुस्लिम बहुल इलाकों में दिया गया एक बयान अब सियासी प्रयोगशाला में ‘रिएक्शन’ देने लगा है। अंसारी ने अल्पसंख्यक आबादी की 19 प्रतिशत हिस्सेदारी का जिक्र करते हुए मुस्लिम प्रत्याशी के पक्ष में मतदान की अपील की थी।
बिरंची नारायण का ’81 प्रतिशत’ वाला जवाब
मंत्री इरफान अंसारी के बयान पर कड़ा रुख अपनाते हुए बोकारो के पूर्व विधायक बिरंची नारायण ने अब मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने अंसारी के 19 प्रतिशत वाले गणित के जवाब में 81 प्रतिशत आबादी को एकजुट होने का आह्वान किया। बिरंची नारायण ने बीजेपी समर्थित प्रत्याशी अविनाश कुमार के पक्ष में प्रचार करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि शेष आबादी अपनी ताकत दिखाए। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में यहां तक कह दिया, “अगर भगवती कॉलोनी जाना हो तो हमारे समर्थित उम्मीदवार को चुनिए और अगर भर्रा (अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र) जाना हो तो उनके।”
बड़े भाई और छोटे भाई की सियासत
कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार जमील अख्तर के पक्ष में प्रचार करने पहुंचे इरफान अंसारी ने आदिवासी और अल्पसंख्यक आबादी का समीकरण समझाते हुए कहा था कि हम सिर्फ वोट देने के लिए नहीं हैं, मेयर चुनाव में भी हमारा हक बनता है। उन्होंने मतदाताओं से ‘बड़े भाई और छोटे भाई’ वाला रिश्ता निभाते हुए समर्थन मांगा था। हालांकि, बीजेपी ने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया और चास के चुनावी मैदान में इसे सीधे तौर पर ध्रुवीकरण से जोड़ दिया।
जनता के मन में क्या है?
मेयर पद के लिए इस बार 31 प्रत्याशी मैदान में हैं, लेकिन असली मुकाबला अब इन बयानों के इर्द-गिर्द सिमटता दिख रहा है। हालांकि, चास की शांतिप्रिय जनता इस बयानबाजी को कितना गंभीरता से लेती है, यह कहना मुश्किल है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ध्रुवीकरण की कोशिश अक्सर ‘साइलेंट खिलाड़ियों’ जैसे भोलू पासवान, गोपाल मुरारका या विकास पांडेय को फायदा पहुंचा सकती है। 23 फरवरी को होने वाले मतदान और 27 फरवरी की मतगणना के बाद ही साफ होगा कि चास की गलियों में विकास का मुद्दा जीता या फिर यह सियासी तीर अपना लक्ष्य भेदने में सफल रहा।



