Chaibasa News: झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था और मानवता के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। चाईबासा सदर अस्पताल में एक लाचार पिता को अपने मृत बच्चे के लिए एंबुलेंस तक नसीब नहीं हुई। नतीजा यह हुआ कि कलेजे के टुकड़े को एक प्लास्टिक के थैले (झोले) में बंद कर वह पिता बस के धक्कों और लोगों की नजरों से अपना दर्द छिपाते हुए 70 किलोमीटर दूर अपने गांव पहुंचा। यह मंजर जिसने भी देखा, उसकी रूह कांप गई।
इलाज की उम्मीद लेकर आए थे, झोले में मिली मौत
बस का सफर और आंखों में बेबसी का सैलाब
सदर अस्पताल से नोवामुंडी तक के सफर में वह पिता बस की एक सीट पर खामोश बैठा रहा। गोद में वह झोला था, जिसमें उसका मृत बेटा शांत पड़ा था। बस में बैठे अन्य यात्रियों को भनक तक नहीं थी कि उनके पास वाली सीट पर एक पिता अपने बच्चे की ‘आखरी यात्रा’ झोले में तय कर रहा है। शुक्रवार की देर रात जब वह पैदल अपने गांव बालजोड़ी पहुंचे, तब जाकर यह दर्दनाक दास्तां दुनिया के सामने आई। स्थानीय लोग अब इस घटना को लेकर प्रशासन और स्वास्थ्य मंत्री पर सवाल उठा रहे हैं।
क्या गरीबी छीन लेगी ‘सम्मानजनक विदाई’ का हक?
यह पहली बार नहीं है जब झारखंड के किसी सरकारी अस्पताल से ऐसी हृदयविदारक तस्वीर आई हो। कोलहान क्षेत्र में विकास के बड़े-बड़े नारों के बीच एक आदिवासी पिता की यह बेबसी सवाल खड़ा करती है कि क्या अस्पताल में रखी एंबुलेंस सिर्फ सफेद हाथी हैं? क्या एक गरीब के पास मरने के बाद सम्मान के साथ अपने घर पहुंचने का हक भी नहीं बचा? चाईबासा की इस घटना ने पूरे तंत्र को आत्ममंथन करने पर मजबूर कर दिया है।



