New Delhi: भारतीय रेलवे का अधिकांश नेटवर्क ब्रॉड गेज यानी 1676 मिलीमीटर चौड़ी पटरियों पर बना हुआ है। इसके विपरीत दुनिया भर में बुलेट ट्रेनें अंतरराष्ट्रीय मानक के तहत स्टैंडर्ड गेज यानी 1435 मिलीमीटर चौड़ाई वाली पटरियों पर ही चलती हैं। ट्रेन की डिजाइनिंग और उसके पहियों की बनावट पूरी तरह इसी चौड़ाई के हिसाब से तैयार की जाती है। यदि बुलेट ट्रेन को पुराने ब्रॉड गेज ट्रैक पर चलाया जाएगा, तो उसकी पूरी प्रणाली काम नहीं कर पाएगी।
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ट्रैक की क्षमता और भारी दबाव
रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पारंपरिक रेल ट्रैक अधिकतम 160 से 200 किलोमीटर प्रति घंटे की गति को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। जब कोई ट्रेन 320 किलोमीटर प्रति घंटे की अत्यधिक रफ्तार से दौड़ती है, तो पटरियों और पहियों के बीच भारी दबाव, कंपन और घर्षण पैदा होता है। सामान्य पटरियां इस अत्यधिक लोड और झटके को सहन नहीं कर सकतीं। बिना उपयुक्त मजबूत ट्रैक के इतने ऊंचे स्पीड लेवल पर ट्रेन चलाने से दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है।
बैलास्टलेस कंक्रीट स्लैब ट्रैक की जरूरत
आम रेलवे पटरियों के नीचे कंकड़-पत्थर बिछे होते हैं, जो ट्रेन के वजन को संभालते हैं। जब कोई ट्रेन 300 किमी प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार से गुजरती है, तो हवा के भारी दबाव और कंपन के कारण ये पत्थर हवा में उड़ने लगते हैं, जिससे ट्रेन की बॉडी और उसके पुर्जों को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है। यही कारण है कि बुलेट ट्रेन के लिए विशेष बैलास्टलेस कंक्रीट स्लैब ट्रैक बनाए जाते हैं, जो पूरी तरह पत्थरों से रहित होते हैं और पटरियों को अपनी जगह जमा कर रखते हैं।
सीधे मार्ग और हल्के मोड़ों की अनिवार्यता
सामान्य भारतीय रेल पटरियां जमीन की बनावट के हिसाब से बिछाई जाती हैं, जिनमें कई जगह तीखे मोड़ और ढलान होते हैं। सामान्य ट्रेनों के लिए तो यह ठीक है, लेकिन इतनी तेज रफ्तार में अचानक आया तीखा मोड़ बुलेट ट्रेन को पटरी से उतार सकता है। हाई-स्पीड ट्रेनों को सुचारू रूप से चलाने के लिए सीधे और समतल मार्ग की जरूरत होती है। यही वजह है कि बुलेट ट्रेन के लिए ज्यादातर रास्ते एलिवेटेड यानी खंभों पर पुल बनाकर तैयार किए जा रहे हैं ताकि मोड़ बेहद हल्के हों।
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एडवांस सिग्नलिंग और सुरक्षा इंतजाम
हाईस्पीड रेल के लिए पारंपरिक सिग्नलिंग सिस्टम पूरी तरह बेअसर साबित होता है। रिपोर्ट के मुताबिक 320 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रही ट्रेन का ड्राइवर बाहर लगे सिग्नल देखकर तुरंत फैसला नहीं ले सकता। इसके लिए ट्रेन के अंदर ही ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल और अत्याधुनिक सिग्नलिंग स्क्रीन दी जाती है, जो पटरी से मिल रहे संकेतों के आधार पर खुद ब्रेक या स्पीड तय करती है। पुरानी पटरियों पर यह एडवांस डिजिटल सिग्नलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा, भारतीय रेल पटरियां अक्सर खुली होती हैं, जहां जानवरों या इंसानों के अचानक सामने आने का जोखिम बना रहता है। बुलेट ट्रेन के पूरे रूट को कंक्रीट की दीवारों और मजबूत बाड़ से पूरी तरह सील किया जाता है ताकि ट्रेन बिना किसी बाधा के दौड़ सके।




