रांची: झारखंड में वर्ष 2025 से लेकर अब तक पुलिसिया कार्यप्रणाली और प्राथमिकियों (FIR) के स्तर पर एक बेहद चिंताजनक ट्रेंड देखने को मिला है। पुलिस द्वारा छोटे या मध्यम स्तर के मामलों को जानबूझकर ‘बड़ा और संगीन’ बनाने, रसूखदारों के दबाव में आकर या फिर त्वरित लोकप्रियता (मीडिया ट्रायल) के चक्कर में गैर-जमानती धाराएं थोपने की घटनाएं बढ़ी हैं। इस विशेष रिपोर्ट में हम विश्लेषण करेंगे कि कैसे वर्ष 2025-26 के बीच झारखंड पुलिस ने कई मामलों में अभियुक्तों को ‘खूंखार अपराधी’ मानकर चार्जशीट दाखिल की, लेकिन अदालत की चौखट पर पहुंचते ही पुलिस की पूरी कहानी ताश के पत्तों की तरह ढह गई और कोर्ट ने अभियुक्तों को बाइज्जत बरी कर दिया।

झारखंड पुलिस के अनुसंधान (Investigation) के स्तर में आ रही गिरावट और एफआईआर को सनसनीखेज बनाने की होड़ ने राज्य की न्याय प्रणाली पर दबाव बढ़ा दिया है। वर्ष 2025 की शुरुआत से लेकर 2026 के मध्य तक के आंकड़ों और अदालती फैसलों का विश्लेषण करें, तो एक हैरान करने वाला पैटर्न सामने आता है। पुलिस जिसे अपनी नजर में “अंधा केस सुलझाना” या “बड़े अपराधियों की धरपकड़” कह रही थी, उसे अदालतों ने ‘खराब अनुसंधान’, ‘मनगढ़ंत कहानी’ और ‘नागरिकों के उत्पीड़न’ का जरिया माना है।

मामूली जमीनी विवाद को बनाया ‘लेवी और रंगदारी’ का केस (रांची, अगस्त 2025)

वर्ष 2025 के अगस्त महीने में रांची के ग्रामीण इलाके में दो सहोदर भाइयों के बीच महज 2 कट्ठा जमीन को लेकर हिंसक झड़प हुई। स्थानीय थाना पुलिस ने रसूखदार पक्ष के प्रभाव में आकर इस मामूली विवाद को उग्रवादी संगठन के नाम पर ‘लेवी (रंगदारी) मांगने’ और ‘जानलेवा हमले’ (तत्कालीन आईपीसी की धारा 307/384 और आर्म्स एक्ट) का रूप दे दिया। पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अभियुक्त को ‘हार्डकोर अपराधी’ घोषित कर दिया।

कोर्ट का फैसला (जनवरी 2026): जब यह मामला रांची सिविल कोर्ट के समक्ष ट्रायल पर आया, तो पुलिस एक भी ऐसा स्वतंत्र गवाह या सबूत पेश नहीं कर सकी जो यह साबित करे कि कोई रंगदारी मांगी गई थी या हथियार लहराए गए थे। कोर्ट ने पुलिस डायरी को ‘पूरी तरह से मनगढ़ंत’ बताते हुए अभियुक्त को बाइज्जत बरी किया और तल्ख टिप्पणी की कि “पुलिस अपनी अक्षमता छुपाने के लिए नागरिकों को उग्रवादी बताने की कोशिश न करे।” इसके बावजूद, स्थानीय पुलिस रिकॉर्ड में आज भी उस व्यक्ति को संदेहास्पद श्रेणी में रखा गया है।

सोशल मीडिया पोस्ट पर ‘देशद्रोह’ और ‘सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने’ की धाराएं (धनबाद, नवंबर 2025)

धनबाद के एक युवक ने स्थानीय नगर निगम के भ्रष्टाचार के खिलाफ सोशल मीडिया पर एक तीखा पोस्ट लिखा था। पुलिस ने सत्ताधीशों को खुश करने के चक्कर में उस युवक पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की अत्यंत गंभीर और गैर-जमानती धाराएं लगा दीं, जिससे यह प्रतीत हो कि युवक किसी बड़े दंगे या राष्ट्रविरोधी साजिश का हिस्सा था। पुलिस ने उसे सलाखों के पीछे भेज दिया और उसे ‘शातिर मास्टरमाइंड’ की तरह पेश किया।

कोर्ट का फैसला (मार्च 2026): झारखंड हाईकोर्ट ने इस मामले में न केवल युवक को बरी किया, बल्कि धनबाद पुलिस के तत्कालीन अनुसंधान पदाधिकारी (IO) को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि रचनात्मक आलोचना को ‘बड़ा अपराध’ बताना पुलिसिया तानाशाही का प्रमाण है। कोर्ट के बरी करने के बाद भी, स्थानीय थाना पुलिस उस युवक के चरित्र प्रमाण पत्र (Character Certificate) को यह कहकर लटकाए हुए है कि “वह पुलिस की नजर में अभी भी संदेहास्पद है।”

कमर्शियल डिफ़ॉल्ट को ‘करोड़ों का गबन और धोखाधड़ी’ का रूप (जमशेदपुर, फरवरी 2026)

हाल ही में फरवरी 2026 में जमशेदपुर के एक छोटे ठेकेदार और बड़ी कंपनी के बीच भुगतान को लेकर सिविल विवाद हुआ। पुलिस ने दीवानी मामले (Civil Dispute) को आपराधिक रंग देते हुए धारा 420 और 406 के तहत केस को इतना बड़ा बना दिया जैसे कोई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय घोटाला हुआ हो। ठेकेदार को ‘आदतन ठग’ बताकर जेल भेज दिया गया।

कोर्ट का फैसला (मई 2026): कोर्ट ने पाया कि मामला शुद्ध रूप से दो कंपनियों के बीच पैसे के लेनदेन का था, जिसमें कोई आपराधिक मंशा (Mens Rea) नहीं थी। अदालत ने त्वरित सुनवाई करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

पुलिस दोषी क्यों मानती रहती है?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देश की सर्वोच्च न्यायपालिका या राज्य की अदालतें किसी व्यक्ति को साक्ष्यों के अभाव में या पुलिस की झूठी कहानी के कारण बरी कर देती हैं, तो भी पुलिस महकमा उसे ‘अपराधी’ क्यों समझता रहता है? इसके पीछे पुलिस की आंतरिक मानसिकता है:

  • अहंकार और थ्योरी की जिद: पुलिस अधिकारी कभी यह स्वीकार नहीं करना चाहते कि उनका अनुसंधान गलत या पूर्वाग्रह से ग्रसित था।

  • क्राइम रिकॉर्ड का दबाव: थानों के रिकॉर्ड (क्राइम हिस्ट्री शीटर सूची) में एक बार नाम चढ़ने के बाद, पुलिस उसे मिटाने में दिलचस्पी नहीं दिखाती।

  • संदेह का लाभ: पुलिस का तर्क होता है कि “आरोपी छूटा नहीं है, बल्कि सबूतों की कमी से बरी हुआ है,” जो कि न्यायशास्त्र के मूल सिद्धांत ‘निर्दोष जब तक कि दोष सिद्ध न हो’ के बिल्कुल विपरीत है।

सुधार की आवश्यकता

वर्ष 2025 से 2026 के बीच के ये उदाहरण चीख-चीख कर कह रहे हैं कि झारखंड पुलिस को ‘केस को जबरन बड़ा दिखाने’ की अपनी इस औपनिवेशिक (Colonial) मानसिकता से बाहर निकलना होगा। एफआईआर में अनावश्यक धाराएं जोड़ने से थानों की वाहवाही तो कुछ समय के लिए मीडिया में हो जाती है, लेकिन अंततः कोर्ट में राज्य सरकार की किरकिरी होती है और जनता का कानून पर से विश्वास उठता है।

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