Health Desk: भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर स्वाद के चक्कर में सेहत को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद का मानना है कि हमारी थाली में मौजूद ‘रस’ या स्वाद ही हमारे शरीर के भाग्य का फैसला करते हैं। वात, पित्त और कफ—ये तीनों दोष हमारे शरीर की पूरी मशीनरी को नियंत्रित करते हैं। जैसे ही इनका संतुलन बिगड़ता है, शरीर बीमारियों का घर बन जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भोजन के छह प्रमुख रसों—मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा) और कषाय (कसैला)—का इन दोषों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

वात दोष: सूखेपन और दर्द का कारण— अगर आप बहुत अधिक तीखा, कड़वा या कसैला भोजन करते हैं, तो सावधान हो जाएं। ये स्वाद शरीर में ‘वात’ को बढ़ाते हैं, जिससे गैस, जोड़ों में दर्द, बेचैनी और शरीर में सूखापन जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं। वात को शांत करने के लिए मीठा, नमकीन और खट्टा स्वाद जादू की तरह काम करता है। हल्का गर्म और थोड़ा चिकनाई युक्त भोजन वात रोगियों के लिए रामबाण है।

पित्त दोष: शरीर की ‘अग्नि’ का संतुलन— पित्त का सीधा संबंध हमारे पाचन और शरीर की गर्मी से है। जो लोग जरूरत से ज्यादा मसालेदार, खट्टा या नमकीन खाना पसंद करते हैं, उनके शरीर में पित्त उबलने लगता है। इससे एसिडिटी, सीने में जलन, त्वचा रोग और चिड़चिड़ापन जैसी शिकायतें आम हो जाती हैं। पित्त को काबू में रखने के लिए कड़वे, मीठे और कसैले रसों का सहारा लेना चाहिए। ताजे फल और हरी सब्जियां शरीर की इस अग्नि को शांत रखने में मदद करती हैं।

कफ दोष: सुस्ती और भारीपन की जड़— शरीर की मजबूती और नमी ‘कफ’ से जुड़ी है, लेकिन इसका अधिक होना मोटापे और सुस्ती का कारण बनता है। मीठा, नमकीन और खट्टा स्वाद कफ को तेजी से बढ़ाते हैं, जिससे बलगम, वजन बढ़ना और भारीपन महसूस होता है। कफ को संतुलित करने के लिए तीखा, कड़वा और कसैला स्वाद सबसे बेहतर माना जाता है। हल्का और गर्म भोजन कफ दोष को दूर कर शरीर में नई ऊर्जा भर देता है।

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आयुर्वेद का निचोड़ यही है कि यदि व्यक्ति अपनी शारीरिक प्रकृति को पहचानकर इन छहों रसों का संतुलित सेवन करे, तो वह बिना दवाओं के भी ताउम्र स्वस्थ और ऊर्जावान बना रह सकता है। संतुलित आहार ही सुखी जीवन का असली आधार है।

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