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बचपन पर भारी ‘बस्ता’: पढ़ाई के बोझ से डिप्रेशन में जा रहे हैं बच्चे!

Lifestyle News: आज के इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा वाले दौर में, जहां हर माता-पिता अपने बच्चे को ‘टॉपर’ देखना चाहते हैं, वहीं मासूमों का बचपन कहीं खोता जा रहा है। आधुनिक जीवनशैली और पढ़ाई के बढ़ते बोझ ने बच्चों को एक ऐसे मानसिक चक्रव्यूह में फंसा

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Lifestyle News: आज के इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा वाले दौर में, जहां हर माता-पिता अपने बच्चे को ‘टॉपर’ देखना चाहते हैं, वहीं मासूमों का बचपन कहीं खोता जा रहा है। आधुनिक जीवनशैली और पढ़ाई के बढ़ते बोझ ने बच्चों को एक ऐसे मानसिक चक्रव्यूह में फंसा दिया है, जिसका दर्द वे अक्सर बयां नहीं कर पाते। विशेषज्ञों की मानें तो बच्चे वयस्कों की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील होते हैं और जब वे तनाव या डर महसूस करते हैं, तो उसे शब्दों के बजाय अपने व्यवहार से जाहिर करते हैं।

व्यवहार में आए बदलाव को ‘नखरा’ न समझें

अक्सर देखा गया है कि जब बच्चा चिड़चिड़ा होता है या चुपचाप रहने लगता है, तो माता-पिता इसे उसके ‘नखरे’ या अनुशासनहीनता समझकर डांट देते हैं। लेकिन यह एक बड़ा संकेत हो सकता है। अगर आपका बच्चा अचानक खाना खाने से मना कर दे, अपने पसंदीदा खेल में रुचि खो दे या दोस्तों से मिलना बंद कर दे, तो यह समझ लीजिए कि उसके मन पर किसी बात का गहरा दबाव है।

स्वभाव का बदलना है खतरे की घंटी

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्वभाव में अचानक आया बदलाव सबसे बड़ा लक्षण है। यदि कोई मिलनसार बच्चा अचानक खुद को कमरे में कैद कर ले, या एक शांत रहने वाला बच्चा अचानक बहुत ज्यादा बोलने लगे, तो यह इस बात का सबूत है कि वह अंदरूनी तौर पर किसी बात से जूझ रहा है।

माता-पिता कैसे बनें ढाल?

इस संकट से बाहर निकलने के लिए माता-पिता को ‘पुलिस’ नहीं, बल्कि ‘दोस्त’ बनना होगा। बच्चों के दोस्तों के बारे में जानें और समय-समय पर उन्हें घर बुलाएं, ताकि आप उनके माहौल को समझ सकें।

डिनर टेबल की बातचीत है संजीवनी

अक्सर भागदौड़ में परिवार एक साथ समय नहीं बिता पाता। रात के खाने (डिनर) के दौरान अपने दिनभर की बातें बच्चों से साझा करें। जब आप अपनी भावनाएं व्यक्त करेंगे, तभी बच्चा भी अपनी बातें कहना सीखेगा। सबसे जरूरी बात यह है कि जब बच्चा कुछ कहना चाहे, तो अपना फोन छोड़कर उसे पूरा ध्यान दें। उस पर चिल्लाने या तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय, शांत स्वर में उसकी समस्या सुनें। आपकी एक मुस्कुराहट और नरम आवाज बच्चे को मानसिक रूप से फौलाद बना सकती है। याद रखें, शिक्षा का उद्देश्य जीवन जीना सिखाना है, न कि जीवन के आनंद को छीन लेना।

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