पुण्यतिथि विशेष भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका
रांची। 5 नवंबर 2011 को भारतीय संगीत जगत ने अपनी एक ऐसी गूंज खो दी थी जिसकी भरपाई शायद कभी मुमकिन नहीं। ‘ब्रह्मपुत्र के चारण’ कहे जाने वाले भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका की पुण्यतिथि पर जब भी उनका नाम जेहन में आता है, कानों में एक भारी, गंभीर और दिल की गहराइयों तक उतर जाने वाली आवाज तैरने लगती है-‘दिल हूम हूम करे, घबराए…’।
डॉ. हजारिका केवल एक पार्श्व गायक, संगीतकार या गीतकार नहीं थे, वे संस्कृति के जीते-जागते सेतु थे, जिन्होंने पूर्वोत्तर भारत की लोकधुनों और मिट्टी की सौंधी खुशबू को मुख्यधारा के भारतीय सिनेमा और वैश्विक मंच पर अमर बना दिया।
बचपन की प्रतिभा और न्यूयॉर्क में पॉल रोबसन से मुलाकात
8 सितंबर 1926 को असम के तिनसुकिया जिले के सादिया में जन्मे भूपेन दा बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने महज 10 वर्ष की उम्र में अपना पहला गाना रिकॉर्ड कराया और 12 साल की उम्र में असमिया फिल्म ‘इंद्रमालती’ (1939) में गाकर सिनेमाई सफर की शुरुआत कर दी थी।
गुवाहाटी और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे मास कम्युनिकेशन में पीएचडी करने अमेरिका की प्रतिष्ठित कोलंबिया यूनिवर्सिटी पहुंचे। न्यूयॉर्क में बिताए दिनों ने उनके जीवन का फलसफा ही बदल दिया। वहां उनकी मुलाकात प्रसिद्ध अमेरिकी नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और गायक पॉल रोबसन से हुई। रोबसन के मशहूर अश्वेत संघर्ष गीत ‘ओल्ड मैन रिवर’ ने भूपेन हजारिका को इस कदर झकझोरा कि उन्होंने लौटकर ब्रह्मपुत्र पर कालजयी गीत रच डाला—‘विस्तीर्ण दुपारे, असंख्या मानुहेर…’ जिसे हिंदी में उन्होंने गाया, ‘गंगा बहती हो क्यों, शांत बहती हो क्यों…’। यह सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि समाज की सोई हुई चेतना पर करारा तमाचा था।
हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर ‘रुदाली’ का अमर संगीत
बॉलीवुड के गलियारों में भूपेन हजारिका का प्रवेश व्यावसायिक चमक-दमक के लिए नहीं, बल्कि मिट्टी की सच्ची खुशबू बिखेरने के लिए हुआ था। मशहूर फिल्मकार कल्पना लाजमी के साथ उनकी रचनात्मक जुगलबंदी ने भारतीय सिनेमा को कुछ सबसे यादगार संगीत उपहार दिए।
1993 में आई फिल्म ‘रुदाली’ का संगीत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। महाश्वेता देवी की कहानी पर बनी इस फिल्म में राजस्थान के रेगिस्तान, जातिगत दंश और आंसुओं का व्यापार करने वाली महिलाओं के दर्द को हजारिका के संगीत ने अमर बना दिया। लता मंगेशकर की आवाज में ‘दिल हूम हूम करे’ और खुद भूपेन दा के भारी सुरों में इसका पुरुष संस्करण आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे मार्मिक गीतों में गिना जाता है। इस फिल्म के लिए उन्हें ‘एशिया पैसिफिक इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ (जापान) में सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का पुरस्कार भी मिला था। इसके अलावा उन्होंने ‘एक पल’ (1986), ‘दरमियां’ (1997), ‘दमन’ (2001) और ‘क्योंकि’ जैसी फिल्मों में भी अपने जादुई संगीत का लोहा मनवाया।
जब लोकधुनों को मिला आधुनिक सिनेमाई कैनवास
भूपेन दा के संगीत की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे लोकगीतों की आत्मा को छुए बिना उसे आधुनिक वाद्ययंत्रों और ऑर्केस्ट्रा के साथ ढालना जानते थे। बिहू की चपलता, कामरूप के लोक सुर और असम के चाय बागानों के कुलियों की पीड़ा उनके सुरों में जीवंत हो उठती थी।
1975 में आई असमी फिल्म ‘चमेली मेमसाब’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसी फिल्म का संगीत बाद में जब हिंदी में रूपांतरित हुआ, तो पूरे देश ने पूर्वोत्तर की उस मधुर बांसुरी और ढोल की थाप को महसूस किया। उन्होंने साबित किया कि भाषा चाहे असमी हो, बांग्ला हो या हिंदी, सच्चे दर्द और संवेदना की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती।
एक नजर में डॉ. भूपेन हजारिका का सफरनामा
| पहलू | विवरण |
| जन्म | 8 सितंबर 1926, सादिया (असम) |
| पुण्यतिथि | 5 नवंबर 2011, मुंबई |
| उपनाम | ‘बार्ड ऑफ ब्रह्मपुत्र’, ‘सुधाकंठ’ |
| यादगार हिंदी गीत | दिल हूम हूम करे, गंगा बहती हो क्यों, समय ओ धीरे चलो, मौला ओ मौला |
| प्रमुख सम्मान | पद्म श्री (1977), दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (1992), पद्म भूषण (2001), पद्म विभूषण (2012), भारत रत्न (2019) |
मानवता का वह गायक जो कभी खामोश नहीं होगा
भूपेन हजारिका ने एक बार कहा था-“मैं केवल मनोरंजन के लिए नहीं गाता, मैं मनुष्य को जगाने के लिए गाता हूं।” उन्होंने सिनेमा को कभी केवल बॉक्स-ऑफिस का खेल नहीं माना, बल्कि सामाजिक बदलाव, समरसता और हाशिए पर खड़े इंसानों की आवाज बनने का जरिया बनाया।
5 नवंबर 2016 को जब उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा होगा, तो उनका संगीत सिर्फ यादों का हिस्सा नहीं होगा, बल्कि वह उस जलते हुए दीये की तरह होगा, जो भारतीय सिनेमा और संगीत जगत को सादगी, गहराई और आत्मा से भरे रहने का रास्ता दिखाता रहेगा।







