रांची। झारखंड की राजधानी रांची के व्यस्ततम हजारीबाग रोड पर कोकर चौक से बमुश्किल आधा किलोमीटर आगे बढ़ने पर दाईं ओर लाल बलुआ पत्थरों से तराशी गई एक बेहद नफीस और नक्काशीदार मजार नजर आती है। धूल, शोर और तेजी से रफ्तार भरते वाहनों के बीच यह गुमनाम मजार आज भी एक खामोश दास्तान समेटे खड़ी है। सड़क से गुजरने वाले मुसाफिर एक पल के लिए इस खूबसूरत संरचना को हसरत भरी निगाहों से देखते जरूर हैं, मगर इस बात से पूरी तरह अनजान हैं कि इस मिट्टी के नीचे भारत के आधुनिक इतिहास का एक ऐसा चमकता सितारा चिरनिद्रा में लीन है, जिसने कभी देश का भूगोल और तकदीर दोनों तय किए थे।
यह मजार है सर सैयद अली इमाम की। वह शख्सियत, जिन्होंने सबसे पहले बंगाल के साये से बाहर निकालकर एक स्वतंत्र बिहार की परिकल्पना की थी और अंग्रेजी हुकूमत के दौर में कलकत्ता के बजाय दिल्ली को हिंदुस्तान की राजधानी बनाने का ऐतिहासिक खाका तैयार किया था। आजाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जिन्हें श्रद्धापूर्वक ‘आधुनिक बिहार का निर्माता’ कहा था, वे आज इसी कोकर की लाल मिट्टी में ‘सोए’ हुए हैं।
इल्म, अदब से लेकर वकालत की बुलंदी तक
सर सैयद अली इमाम का जन्म 11 फरवरी 1869 को बिहार के पटना जिले स्थित ऐतिहासिक गांव नेउरा (न्यौरा) में हुआ था। उनके वालिद नवाब सैयद इमदाद इमाम ‘असर’ अजीमाबादी अपने दौर के जाने-माने विद्वान, अरबी व इतिहास के प्रोफेसर और प्रख्यात शायर थे। पिता के साहित्यिक और बौद्धिक संस्कारों की छत्रछाया में पले-बढ़े अली इमाम बचपन से ही असाधारण प्रतिभा के धनी थे। शुरुआती तालीम के बाद वे उच्च शिक्षा और कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए, जहां उन्होंने लंदन के प्रसिद्ध ‘मिडिल टेम्पल’ से बैरिस्ट्री की डिग्री हासिल की।
साल 1890 में वतन लौटने के बाद वे कलकत्ता उच्च न्यायालय की स्थायी समिति में शामिल हुए और वकालत की शुरुआत की। उस दौर में अंग्रेजों के वर्चस्व वाली अदालतों में किसी हिंदुस्तानी बैरिस्टर के लिए अपनी धाक जमाना आसान नहीं था, लेकिन अली इमाम की प्रखर तार्किकता, निर्भीक शैली और बेजोड़ कानूनी समझ ने उन्हें जल्द ही मुकदमों का सिरमौर बना दिया। कानूनी हलकों में उनका रसूख इस कदर बढ़ गया कि उन्हें वकीलों और बैरिस्टरों का अगुआ माना जाने लगा और अदालतों में उन्हें सम्मान से ‘न्यायालय का डंडा’ कहकर पुकारा जाता था। 1917 में वे पटना उच्च न्यायालय के अवर न्यायाधीश (जज) नियुक्त हुए।
आधुनिक बिहार का उदय और ऐतिहासिक नेतृत्व
बीसवीं सदी की शुरुआत में बिहार का कोई स्वतंत्र प्रशासनिक अस्तित्व नहीं था और वह विशाल बंगाल प्रेसीडेंसी का एक उपेक्षित हिस्सा मात्र था। प्रशासन, रोजगार और शिक्षा के हर बड़े केंद्र पर कलकत्ता का आधिपत्य था। ऐसे में अली इमाम उन शुरुआती दूरदर्शी नायकों में थे, जिन्होंने यह समझा कि जब तक बिहार प्रशासनिक रूप से स्वायत्त नहीं होगा, तब तक इस क्षेत्र के लोगों का सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक उत्थान संभव नहीं है।
वर्ष 1908 में जब बिहार के इतिहास का पहला प्रांतीय सम्मेलन आयोजित हुआ, तो सर्वसम्मति से इसकी अध्यक्षता का दायित्व सर अली इमाम को ही सौंपा गया। इस ऐतिहासिक सम्मेलन के मंच से उन्होंने पूरी दृढ़ता के साथ बंगाल से पृथक कर स्वतंत्र बिहार राज्य के गठन की पुरजोर मांग उठाई। यह सम्मेलन बिहार के अस्तित्व की लड़ाई में मील का पत्थर साबित हुआ। सच्चिदानंद सिन्हा, महेश नारायण और सर अली इमाम जैसे दूरंदेश नेताओं की इस साझी मुहिम का ही नतीजा था कि 1912 में ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा और बिहार तथा ओडिशा को बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग कर एक नए प्रांत की मान्यता देनी पड़ी।
जब बदला देश का केंद्र: कलकत्ता से दिल्ली राजधानी का सफर
सर सैयद अली इमाम की सियासी और प्रशासनिक क्षमता का लोहा अंग्रेज सरकार भी मानती थी। उनकी काबिलियत का सम्मान करते हुए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘सर’ (नाइटहुड) के सर्वोच्च खिताब से नवाजा था। वर्ष 1910 से 1916 तक वे वायसराय की गवर्नर जनरल एक्जीक्यूटिव काउंसिल के ‘लॉ मेंबर’ (विधि सदस्य) रहे। 1911 में वे गवर्नर जनरल काउंसिल के उपाध्यक्ष भी बने।
उस वक्त ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता हुआ करती थी। लेकिन बदलते राजनीतिक परिदृश्य और देश के भौगोलिक संतुलन को देखते हुए अली इमाम ने एक अत्यंत क्रांतिकारी प्रस्ताव पेश किया। 25 अगस्त 1911 को उन्होंने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग के समक्ष कलकत्ता से देश की राजधानी को हटाकर दिल्ली स्थानांतरित करने का मुकम्मल खाका प्रस्तुत किया। इस ऐतिहासिक दस्तावेज में अली इमाम ने विस्तार से समझाया था कि कैसे दिल्ली पूरे देश के केंद्र में स्थित है और वहां से विशाल उपमहाद्वीप पर बेहतर शासन चलाया जा सकता है। लॉर्ड हार्डिंग इस दलील से इतने प्रभावित हुए कि ब्रिटिश हुकूमत ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और उसी साल दिसंबर में आयोजित ऐतिहासिक दिल्ली दरबार में जॉर्ज पंचम ने भारत की राजधानी नई दिल्ली बनाने का शाही फरमान जारी कर दिया। आज जिस दिल्ली की सत्ता पूरे देश का संचालन करती है, उसकी बुनियाद के पीछे अली इमाम की प्रशासनिक दूरदर्शिता ही काम कर रही थी।
राष्ट्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय पटल पर देश का प्रतिनिधित्व
अली इमाम सिर्फ अदालतों और प्रशासनिक परिषदों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर भी उन्होंने अपनी सशक्त छाप छोड़ी। 1908 में अमृतसर में संपन्न हुए ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के प्रथम वार्षिक अधिवेशन की उन्होंने अध्यक्षता की। 1909 में वे मुस्लिम लीग के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में इंग्लैंड भी गए। हालांकि, वे कभी भी संकीर्ण सांप्रदायिक राजनीति के पक्षधर नहीं रहे। उनका मानना था कि राष्ट्र की संप्रभुता और एकता किसी भी मजहबी बंटवारे से कहीं बढ़कर है।
यही कारण था कि जब 1927 में साइमन कमीशन भारत आया, तो उन्होंने बिना झिझक उसका जमकर विरोध किया। 1928 में उन्होंने मोतीलाल नेहरू समिति की रिपोर्ट का खुला समर्थन किया और साझा निर्वाचन प्रणाली की वकालत की। 1931 में देश के भावी संविधान पर विमर्श के लिए आयोजित गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए वे लंदन भी गए।
उनकी योग्यता केवल ब्रिटिश भारत तक सीमित नहीं रही। 1919 में वे हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान की सरकार की कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष (प्रधानमंत्री) बने। नवंबर 1920 में जब जिनेवा में राष्ट्र संघ (League of Nations-वर्तमान संयुक्त राष्ट्र का पूर्ववर्ती रूप) की पहली ऐतिहासिक बैठक बुलाई गई, तो ब्रिटिश भारत की ओर से भाग लेने वाले वे प्रथम भारतीय प्रतिनिधि थे। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी अंग्रेजी वक्तृता और वैधानिक तर्कों ने दुनिया भर के राजनयिकों को अचंभित कर दिया था।
इमारतों का जुनून: बेल्ला विस्ता से रांची की इमाम कोठी तक
सर सैयद अली इमाम को सुंदर और भव्य वास्तुकला वाली इमारतें बनवाने का बेहद शौक था। पटना में गंगा किनारे स्थित उनकी आलीशान कोठी ‘मरियम मंजिल’ और हैदराबाद में पहाड़ी पर बना उनका शाही महल ‘बेल्ला विस्ता’ (जो आज प्रतिष्ठित प्रशासनिक स्टाफ कॉलेज ऑफ इंडिया का हिस्सा है) उनकी वास्तुकला की नफासत की गवाही देते हैं।
जीवन के अंतिम पड़ाव में जब स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने शांत आबोहवा की तलाश की, तो उन्होंने झारखंड के रांची को चुना। उस वक्त रांची अपनी ठंडी जलवायु और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जानी जाती थी। रांची के कोकर इलाके में उन्होंने लाल ईंटों की एक बेहद विशाल और भव्य हवेली बनवाई, जिसे स्थानीय लोग ‘इमाम कोठी’ और इतिहास के पन्नों में ‘अनीस कैसल’ कहा जाता है। यह कोठी एक समय विशाल बाग-बगीचों, आम-लीची के पेड़ों और दर्जनों कमरों से सजी हुआ करती थी।
अंतिम रात, अधूरा ख्वाब और खाली मजार की उदासी
31 अक्टूबर 1932 की शाम कोकर स्थित इमाम कोठी में सर अली इमाम हमेशा की तरह टहल रहे थे। अचानक वे परिसर के एक खुले हिस्से में रुके और साथ चल रहे अपने बेटे नकी को एक जमीन के टुकड़े की ओर इशारा करते हुए एक अजीब सी बात कही-“बेटा, जब मैं इस दुनिया से रुखसत हो जाऊं, तो ठीक इसी जगह मेरी कब्र बनाना”।
परिवार के लोग इस बात का आशय समझ पाते, उससे पहले ही उसी रात उन्हें दिल का गहरा दौरा पड़ा। सीने में तेज दर्द के बीच उन्होंने अपने सभी पारिवारिक सदस्यों को पास बुलाया, सबसे माफी मांगी और चंद घंटों के भीतर 63 वर्ष की आयु में इस महान विभूति ने सदा के लिए आंखें मूंद लीं।
उनकी वफात के बाद उनकी बेगम अनीस फातिमा ने अपने मरहूम शौहर की आखिरी ख्वाहिश को पूरा करने का बीड़ा उठाया। वे दोनों एक-दूसरे से बेपनाह मोहब्बत करते थे और उनकी ख्वाहिश थी कि जिंदगी के बाद मौत की अंधेरी दुनिया में भी वे दोनों अगल-बगल विश्राम करें। बेगम अनीस फातिमा ने देश के बेहतरीन कारीगरों को बुलाकर लाल बलुआ पत्थर की महीन जालीदार नक्काशी वाला एक शानदार मकबरा बनवाया, जिसे बनने में तीन साल लगे और यह 1935 में मुकम्मल हुआ। मकबरे के भीतर एक संगमरमरी पत्थर पर इस पूरे इतिहास का उल्लेख भी दर्ज कराया गया।
मकबरे में दो कब्रों का ढांचा तैयार किया गया था। एक में सर अली इमाम को सुपुर्द-ए-खाक किया गया, जबकि दूसरी कब्र उनकी बेगम के लिए खाली छोड़ दी गई। मगर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। कुछ वर्षों बाद जब बेगम अनीस फातिमा का इंतकाल हुआ, तो उस समय वे पटना में थीं। परिस्थितियों और दूरियों के चलते उन्हें पटना में ही दफन कर दिया गया। तब से लेकर आज तक, लगभग नौ दशक बीत चुके हैं, लेकिन कोकर के इस मकबरे में सर अली इमाम की कब्र के पास बनी वह दूसरी कब्र आज भी सूनी और खाली पड़ी है, मानो अपने हमसफर के इंतजार में सदियों से पलकें बिछाए बैठी हो।
एक धरोहर को दरकार है नई पहचान
आज सर सैयद अली इमाम की बनाई ‘इमाम कोठी’ का मूल स्वरूप सिमट चुका है और आसपास बहुमंजिला इमारतों का जंगल उग आया है। उनकी ऐतिहासिक मजार पर लगे जालीदार पत्थरों पर वक्त की धूल जम चुकी है। जो शख्स कभी देश का सियासी नक्शा खींचता था, जिसने दिल्ली को राजधानी का ताज पहनाया और बिहार को अलग पहचान दी, उसकी स्मृति आज अपने ही शहर में गुमनाम है।
उनकी पुण्यतिथि और जन्मतिथि पर इतिहास के पन्नों को पलटकर देखना न केवल इस महान सपूत के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाने का भी मौका होगा कि आज हम जिस दिल्ली और जिस आधुनिक बिहार को देखते हैं, उसकी नींव में रांची की इस मिट्टी में सोए सर सैयद अली इमाम का पसीना और असीम बौद्धिक पराक्रम शामिल है।
आज से ठीक दो दिन बाद 31 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि है, अपने संस्थान की ओर से हम उनकी पुण्यतिथि को याद दिला रहे हैं ताकि सरकार और समाजसेवी उनके उल्लेखनीय कार्य को याद करे और भूलाए गए इस नायक को याद कर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करे।

इल्म, अदब से लेकर वकालत की बुलंदी तक
जब बदला देश का केंद्र: कलकत्ता से दिल्ली राजधानी का सफर
अंतिम रात, अधूरा ख्वाब और खाली मजार की उदासी


