Paris: जनहित और महंगाई के नाम पर शुरू होने वाले आंदोलन जब अचानक पेट्रोल बम, लूटपाट और सुनियोजित आगजनी में बदलने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि विरोध का रिमोट कंट्रोल किसी और के हाथ में चला गया है। सड़कों पर उतरने वाले आम नौजवानों के गुस्से की आड़ में जब विदेशी फंडिंग और वैश्विक विचारक अपने नैरेटिव की रोटी सेंकने लगते हैं, तो नुकसान हमेशा उस मुल्क की जनता और उसके लोकतंत्र का ही होता है।
फ्रांस में महंगाई, शिक्षा व्यवस्था और सरकारी नीतियों के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के अचानक हिंसक दंगों में तब्दील होने के पीछे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हाथ होने का सनसनीखेज दावा सामने आया है। हालिया मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, देश के विभिन्न शहरों में भड़की बड़े पैमाने की हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी में करीब 54 संगठनों और उनसे जुड़े वैश्विक समर्थक तंत्र की संदिग्ध भूमिका चिन्हित की गई है। इस नेटवर्क में कम्युनिस्ट एवं सोशलिस्ट समूह, छात्र संगठन, ट्रेड यूनियन, फिलिस्तीन समर्थक संगठन और कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान शामिल बताए जा रहे हैं।
भारतीय मूल के वामपंथी विचारक विजय प्रसाद पर उठे सवाल
रिपोर्ट्स में भारतीय मूल के प्रमुख वामपंथी विचारक और लेखक विजय प्रसाद की गतिविधियों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। विजय प्रसाद ‘ट्राइकॉन्टिनेंटल: इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च’ के कार्यकारी निदेशक हैं, जिस संस्था को अमेरिकी उद्योगपति नेविल रॉय सिंघम से आर्थिक सहायता मिलने के आरोप लगते रहे हैं। प्रदर्शनों के दौरान विजय प्रसाद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर ‘पेरिस-नई दिल्ली-ब्यूनस आयर्स’ लिखकर विभिन्न देशों के आंदोलनों के बीच वैचारिक समानता दर्शाने की कोशिश की थी। सुरक्षा विश्लेषक इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन प्रदर्शनों को हवा देने और समन्वय बनाने के प्रयास के रूप में देख रहे हैं। इसके साथ ही ‘इंडियन अलायंस पेरिस’ नामक संगठन की भूमिका भी जांच के दायरे में है, जिसने भारत और फ्रांस के युवा आंदोलनों को जोड़ने का प्रयास किया था।
प्रधानमंत्री ने वामपंथी दलों पर साधा निशाना, जांच जारी
फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने इस अशांति को लेकर वामपंथी दल ‘ला फ्रांस इंसौमिस’ (LFI) पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक लाभ लेने के लिए कुछ दल जानबूझकर अव्यवस्था और अराजकता को बढ़ावा दे रहे हैं। हालांकि, रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि सूची में शामिल सभी 54 संगठनों की सीधी संलिप्तता हिंसा भड़काने में प्रमाणित नहीं हुई है, बल्कि उनके समर्थन और सोशल मीडिया कैंपेन के जुड़ाव सामने आए हैं। यह आंदोलन शुरुआत में सार्वजनिक नीतियों और आर्थिक चिंताओं को लेकर शांतिपूर्ण था, जिसे बाद में हिंसक तत्वों और सुनियोजित नेटवर्क ने अराजकता की ओर धकेल दिया।





