Ranchi: राजनीति के गलियारों में जब सत्ता की धमक और ओहदे की अकड़ आम बात हो जाती है, तब कुछ ऐसे चिराग भी रोशन होते हैं जिनकी चमक महलों से लेकर झोपड़ियों तक एक जैसी सादगी और आत्मीयता फैलाती है। झारखंड की राजनीति के इतिहास में एक ऐसा ही अमर नाम है-मरहूम हाजी हुसैन अंसारी
23 जुलाई 1947 को मधुपुर के पास पिपरा गांव के एक सीधे-साधे किसान परिवार में जन्मे हाजी साहब ने कभी अपनी जड़ों को नहीं भुलाया। किसान का यह बेटा जब सत्ता के सर्वोच्च शिखरों पर पहुंचा, तब भी उसकी सादगी और जमीनी जुड़ाव में रत्ती भर भी फर्क नहीं आया। वे केवल एक राजनीतिज्ञ या राज्य सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री नहीं थे, बल्कि वे पूरे झारखंड की जनता के अपने प्यारे ‘हाजी साहब’ थे।
जब शिबू सोरेन के साथ मिलकर लिखा इतिहास
हाजी हुसैन अंसारी साहब के राजनीतिक सफर की शुरुआत 1980 के दशक में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से हुई थी। शुरुआती दौर में असफलताएं और संघर्ष हाथ लगे, लेकिन उनके मजबूत इरादे कभी डगमगाए नहीं। 1990 के दशक की शुरुआत में वे ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन की अगुवाई वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) में शामिल हो गए।
यह वह दौर था जब झारखंड आंदोलन अपनी पूरी शिद्दत पर था। हाजी साहब ने गुरुजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अलग झारखंड राज्य के गठन के आंदोलन में एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक भूमिका निभाई। 1995 में उन्होंने पहली बार मधुपुर विधानसभा क्षेत्र से जेएमएम के टिकट पर चुनाव जीता और इसके बाद 2000, 2009 और 2019 में भी भारी जनसमर्थन के साथ कुल चार बार विधायक चुने गए।सन 2004 में वे झारखंड विधानसभा के विपक्ष के नेता चुने गए। इसके बाद 10 अक्टूबर 2010 को जब अर्जुन मुंडा की सरकार बनी, तो उन्हें अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री बनाया गया। इस तरह वे स्वतंत्र झारखंड राज्य के इतिहास में मंत्री बनने वाले पहले मुस्लिम चेहरा बने। बाद में 2013 में हेमंत सोरेन की पहली सरकार और फिर 28 जनवरी 2020 को हेमंत सोरेन की दूसरी सरकार में भी उन्हें अल्पसंख्यक कल्याण और पंजीकरण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। वे सोरेन परिवार के बेहद करीबी और विश्वसनीय नेताओं में से एक रहे, जिन्होंने जीवन पर्यंत संगठन और जनता की निस्वार्थ सेवा की।
एक ऐसा मंत्री जिसके दरवाजे सबके लिए हमेशा खुले रहे
आज के दौर में जब किसी नेता के आवास के बाहर सुरक्षा का कड़ा घेरा होता है और आम इंसान को उनसे मिलने के लिए दर्जनों अर्जियां लगानी पड़ती हैं, तब हाजी साहब का घर एक ऐसा आशियाना था जहां आने के लिए किसी को कोई इजाजत नहीं लेनी पड़ती थी।
मंत्रिपद पर रहने के बावजूद उनके भीतर जरा सा भी अहंकार नहीं था। वे बेहद सरल और ‘डाउन टू अर्थ’ इंसान थे। मधुपुर की जनता हो या राजधानी रांची या फिर राज्य के सुदूर विधानसभा क्षेत्रों से आए हुए बेबस और जरूरतमंद लोग, हाजी साहब हर किसी से बड़े ही अपनेपन और आत्मीयता से मिलते थे। बिना किसी डर, बिना किसी सुरक्षा जांच और बिना किसी औपचारिकता के कोई भी सीधा उनके पास पहुंच सकता था।उनके लिए न कोई अमीर था, न कोई गरीब; न कोई जात थी, न कोई धर्म। वे सभी को एक समान नजर से देखते थे और बिना किसी भेदभाव या देरी के हर किसी का काम करवाने के लिए खुद खड़े हो जाते थे। यही वजह थी कि पूरे झारखंड की आवाम उन्हें किसी नेता की तरह नहीं, बल्कि अपने परिवार के एक बुजुर्ग और अभिभावक की तरह सम्मान देती थी।
पत्रकारिता के प्रति आदर और वह यादगार आत्मीयता
एक पत्रकार होने के नाते मैंने हाजी साहब को बहुत करीब से देखा, समझा और महसूस किया है। राजनीतिक जीवन में जब कोई मंत्री बनता है, तो वह आलोचनाओं और कड़े लेखों से चिढ़ने लगता है। लेकिन हाजी साहब बिल्कुल अलग मिट्टी के बने इंसान थे।
मुझे याद है, वे झारखंड के इकलौते ऐसे मंत्री थे जिनके खिलाफ मैंने पत्रकारिता के दौरान काफी तीखे और कड़े लेख लिखे। लेकिन इसके बावजूद वे कभी मुझ पर न तो नाराज हुए और न ही कभी कोई रंजिश रखी। उल्टा वे अक्सर मुझे स्नेह से अपने पास बुलाते और बड़ी सादगी से पूछते, “क्या बात है? क्या मैं अपने विभाग में ठीक से काम नहीं कर रहा हूं?”जब मैं अपनी राय या आलोचनाएं उनके सामने रखता, तो वे मुस्कुराकर कहते-“तुमसे मुझे प्रेरणा मिलती है। तुम झारखंड के अकेले ऐसे पत्रकार हो जो मेरे खिलाफ बिना किसी डर के निडर होकर लिखते हो। लिखो, खूब लिखो! हमारे समाज में सच लिखने वाले और निडर लोगों की बहुत कमी है।” ऐसा कहकर वे अक्सर मेरा हौसला बढ़ाते थे।
बात सिर्फ वहीं खत्म नहीं होती थी। जब भी मैं उनसे मिलने जाता, वे बड़े ही प्यार से अपने हाथों से सेब काटते, उस पर थोड़ा सा काला नमक छिड़कते और बड़े दुलार से प्लेट मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहते- “इसे खाओ! पहले अपना स्वास्थ्य बेहतर रखो, तभी तो लंबे समय तक समाज के लिए लिख पाओगे। और हां, अपने जैसा निडर और सच लिखने वाला दूसरा दौर भी तैयार करो।”
उनकी यह बातें, वह आत्मीय मुस्कान और हाथ में सेब की प्लेट थमाने का वह अंदाज आज भी मेरी यादों में पूरी तरह ताजा है। ऐसा विशाल हृदय और बड़प्पन सदियों में किसी एक ही व्यक्तित्व के पास होता है।
अलविदा हाजी साहब: जब एक महान चिराग बुझ गया
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। 2018 में उनकी ओपन-हार्ट सर्जरी हुई थी। इसके बाद मार्च 2020 में तबलीगी जमात के सिलसिले में दिल्ली जाने के कारण उन्हें और उनके बेटे को क्वारंटाइन भी रहना पड़ा।
सितंबर 2020 में जब देश कोरोना महामारी के भयानक दौर से गुजर रहा था, तब हाजी साहब भी कोविड-19 से संक्रमित हो गए और उन्हें इलाज के लिए रांची के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया। जीवन भर बीमारियों और मुश्किलों से लड़ने वाले इस योद्धा ने कोरोना जैसी बीमारी को भी हरा दिया और उनका टेस्ट नेगेटिव आ गया।
लेकिन कुदरत को शायद कुछ और ही मंजूर था। कोविड-19 टेस्ट नेगेटिव आने के ठीक एक दिन बाद, 3 अक्टूबर 2020 को लगभग 70 से 73 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने (हृदय गति रुकने) से उनका अचानक निधन हो गया।
इस दुखद खबर ने पूरे झारखंड को स्तब्ध और शोकग्रस्त कर दिया। एक ऐसा जननेता, जिसने पूरी जिंदगी जनता के नाम कर दी थी, वह हमेशा के लिए खामोश हो गया था। उनकी मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए पूरे राज्य में दो दिनों के राजकीय शोक की घोषणा की।
विरासत का सफर: हफीजुल हसन अंसारी से नई उम्मीदें
हाजी साहब के असमय चले जाने के बाद मधुपुर और पूरे झारखंड के लोगों के बीच जो खालीपन पैदा हुआ, उसे भर पाना लगभग नामुमकिन था। लेकिन उनकी उस जनकल्याणकारी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 5 फरवरी 2021 को उनके सुपुत्र हाफ़िज़ुल हसन अंसारी को मंत्रिमंडल में शामिल किया और उन्हें अल्पसंख्यक कल्याण, पर्यटन, कला एवं संस्कृति, तथा युवा मामले और खेल विभाग की जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद हुए मधुपुर विधानसभा उपचुनाव में हफीजुल हसन ने 1,10,812 मत प्राप्त कर शानदार जीत दर्ज की और जनता के उस अटूट विश्वास को कायम रखा।
आज मरहूम हाजी हुसैन अंसारी साहब की पुण्यतिथि के इस मार्मिक अवसर पर हम अपनी पूरी संस्था की ओर से उन्हें भावभीनी और विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
हाजी साहब भले ही आज हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनकी सादगी, उनका निस्वार्थ सेवाभाव और जनता के प्रति उनका असीम प्रेम आज भी झारखंड के हर नागरिक के दिल में जिंदा है। हमें पूरी उम्मीद और विश्वास है कि उनके सुपुत्र और वर्तमान मंत्री हाफिजुल हसन अंसारी अपने महान पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए, उनकी विरासत को पूरी ईमानदारी और शिद्दत से संभालेंगे और मरहूम हाजी साहब के दिखाए जनसेवा के रास्ते पर चलकर राज्य और मधुपुर की जनता का कल्याण करते रहेंगे। “नमन ऐसे अमर व्यक्तित्व को, जो सत्ता के ऊंचे पायदान पर रहकर भी हमेशा आम जनता का होकर रहा।”

विरासत का सफर: हफीजुल हसन अंसारी से नई उम्मीदें


