Spiritual Adda: मंदिर में भगवान की पूजा-अर्चना करने के बाद बाहर आकर सीढ़ियों पर कुछ देर बैठने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। अक्सर लोग दर्शन करते ही सीधे घर की ओर निकल पड़ते हैं, जबकि शास्त्रों और बुजुर्गों के अनुसार यह तरीका सही नहीं है। दर्शन पूरा करने के बाद मंदिर परिसर की सीढ़ी पर बैठकर शांत मन से ईश्वर का ध्यान लगाना और एक विशेष श्लोक का पाठ करना पूजा विधि का अनिवार्य हिस्सा माना गया है।
सीढ़ी पर बैठकर इस श्लोक का करें पाठ
सीढ़ी पर बैठते ही श्रद्धालु को ‘अनायासेन मरणम्, बिना देन्येन जीवनम्। देहान्त तव सानिध्यम्, देहि में परमेश्वरम्’ श्लोक का पाठ करना चाहिए। इस श्लोक का सीधा संदेश यह है कि मनुष्य को ईश्वर से केवल सहज मृत्यु, बिना लाचारी का जीवन और अंत समय में उनका सानिध्य मांगना चाहिए। प्रार्थना का अर्थ केवल निवेदन है, न कि सांसारिक चीजों की याचना। घर, गाड़ी, धन, नौकरी या संतान जैसी वस्तुएं भगवान अपनी कृपा से खुद प्रदान करते हैं, इसलिए इनके लिए मंदिर में याचना करने से बचना चाहिए।
गर्भगृह में खुली और बाहर बंद रखें आंखें
मंदिर के भीतर दर्शन करते समय आंखें बंद करना उचित नहीं माना जाता। जब हम दर्शन के लिए पहुंचे हैं, तो खुली आंखों से भगवान के मुखारविंद, चरण, संपूर्ण स्वरूप और श्रृंगार का दर्शन करना चाहिए। दर्शन के बाद जब बाहर सीढ़ी पर बैठें, तब आंखें बंद करके उस स्वरूप को अपने ध्यान में उतारना चाहिए। यदि आंखें बंद करने पर भगवान की छवि याद न आए, तो दोबारा गर्भगृह जाकर दर्शन करें और फिर लौटकर सीढ़ी पर बैठकर शांत चित्त से ध्यान लगाएं।
मानसिक शांति और लंबी उम्र से जुड़ा नियम
यह परंपरा मात्र एक औपचारिकता नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, दीर्घायु और मानसिक शांति सुनिश्चित करने का माध्यम है। मंदिर के भीतर आंखें खोलकर भगवान के रूप को निहारना और बाहर आकर आंखें बंद कर उसका मनन करना हमारी सच्ची श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। कुछ पल सीढ़ी पर ठहरने से भागदौड़ भरे मन को ठहराव मिलता है और दर्शन का वास्तविक लाभ जीवन में उतरता है।




