Kohima: नागालैंड के हेड हंटर्स का इतिहास एक बेहद अनूठी सांस्कृतिक और युद्ध परंपरा से जुड़ा हुआ है। अतीत में विरोधी कबीलों के बीच आपसी वर्चस्व की जंग में नागा योद्धा अपने दुश्मनों के सिर काट दिया करते थे। इसी खौफनाक प्रथा के चलते उन्हें ‘हेड हंटर्स’ यानी सिर का शिकारी कहा जाने लगा। जंग के मैदान से दुश्मन का सिर काटकर लौटना केवल सैन्य विजय नहीं, बल्कि असीम बहादुरी, आध्यात्मिक ऊर्जा और समाज में सर्वोच्च रुतबे का प्रतीक माना जाता था। यूं तो कई नागा कबीले इस परंपरा का पालन करते थे, लेकिन उत्तरी नागालैंड का कोन्याक कबीला आखिरी हेड हंटर्स के रूप में जाना जाता है, क्योंकि उन्होंने सबसे अंत में इस प्रथा का त्याग किया।
खोपड़ी में आत्मा का वास और समृद्धि की मान्यता
कोन्याक समुदाय की पारंपरिक मान्यता थी कि इंसानी आत्मा के दो हिस्से होते हैं, जिसमें ‘मियो’ यानी जीवन शक्ति खोपड़ी के भीतर निवास करती है। उनका मानना था कि दुश्मन का सिर काटकर अपने गांव लाने से उसकी जीवन शक्ति विजेता के गांव में स्थानांतरित हो जाती है। यह आध्यात्मिक ऊर्जा पूरे कबीले को बीमारियों से बचाती थी, खेतों में अच्छी फसल लाती थी और इलाके की संपन्नता बढ़ाती थी। युवा नागा पुरुषों के लिए यह वयस्कता में कदम रखने की अनिवार्य रस्म थी। जो योद्धा दुश्मन का सिर लाता था, उसे ही समाज में सच्चा मर्द माना जाता था और वह विवाह के योग्य समझा जाता था।
चेहरे पर टैटू और ‘मोरंग’ में खोपड़ियों की नुमाइश
युद्ध में अद्वितीय पराक्रम दिखाने वाले शूरवीरों को चेहरे, गर्दन और छाती पर गहरे नीले रंग के खास टैटू बनाकर सम्मानित किया जाता था। टैटू की तादाद इस बात का प्रमाण होती थी कि योद्धा ने कितने दुश्मनों के सिर काटे हैं। कुछ योद्धा गले में खोपड़ी के आकार के पीतल के लॉकेट भी पहनते थे। काटे गए सिरों को गर्व के साथ घरों के बाहर या सामुदायिक घर ‘मोरंग’ में लटकाया जाता था। जब कोई विजेता गांव लौटता था, तो लकड़ी के विशाल ड्रम ‘लॉग गौंग’ बजाए जाते थे और नए ड्रम का उद्घाटन अक्सर कटे हुए सिर के रक्त से किया जाता था।
1970 के दशक में ऐसे खत्म हुई यह खूनी प्रथा
पहाड़ियों में सदियों तक चली यह रस्म 19वीं सदी में अंग्रेजों और ईसाई मिशनरियों के आगमन के बाद कमजोर पड़ने लगी। मिशनरियों ने नागा समाज को अहिंसा और शिक्षा से जोड़ते हुए इस प्रथा को छोड़ने के लिए प्रेरित किया। देश की आजादी के बाद कड़े कानूनों के प्रवर्तन और 1970 के दशक में म्यांमार सीमा के निर्धारण के साथ इस प्रथा पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई। आज भले ही यह खूनी प्रथा इतिहास बन चुकी है, लेकिन नागा समाज इसे अपनी समृद्ध विरासत और सांस्कृतिक पहचान के एक अहम हिस्से के तौर पर याद रखता है।




