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सीजेआई सूर्यकांत का पटना में संबोधन: बच्चों को नशे से बचाना ही नहीं, पुनर्वास भी जरूरी

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने पटना के लोकभवन में व्याख्यान के दौरान कहा कि बच्चों को नशे से मुक्त कराना केवल इलाज का नहीं, बल्कि शिक्षा, गरिमा और सामाजिक पुनर्वास का समग्र विषय है।
पटना में बोले सीजेआई सूर्यकांत
पटना में बोले सीजेआई सूर्यकांत: बच्चों को नशे से बचाना सिर्फ इलाज नहीं, गरिमा, शिक्षा और सामाजिक पुनर्वास जरूरी

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Patna: बच्चों और किशोरों में तेजी से पैर पसारती मादक पदार्थों की लत पर देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने गहरी चिंता व्यक्त की है। पटना स्थित लोकभवन में आयोजित ‘ड्रग्स से परे बचपन : संरक्षण, देखभाल और पुनर्समावेशन’ विषयक विशेष व्याख्यानमाला को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों का नशे की चपेट में आना केवल स्वास्थ्य या कानून-व्यवस्था से जुड़ा सीमित प्रश्न नहीं है।

यह सीधे तौर पर उनकी सुरक्षा, बुनियादी शिक्षा, पारिवारिक संरचना और देश के भविष्य से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मामला है। पाटलिपुत्र प्रज्ञा प्रवाह द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि बच्चों को सिर्फ नशे के दलदल से बाहर निकालना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें समग्र पुनर्वास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सामान्य सामाजिक जीवन में सम्मानजनक वापसी के पूरे अवसर मिलने चाहिए।

शिक्षा और भविष्य पर नशे का गंभीर आघात

मुख्य न्यायाधीश ने अपने संबोधन में रेखांकित किया कि बाल्यावस्था या किशोरावस्था में मादक द्रव्यों का सेवन जीवन की संपूर्ण दिशा को बाधित कर देता है। नशे के कारण बच्चे धीरे-धीरे नियमित स्कूली शिक्षा और अध्ययन की मुख्यधारा से कटने लगते हैं, जिसका नकारात्मक असर उनके पारिवारिक ताने-बाने और सामाजिक जुड़ाव पर पड़ता है।

उन्होंने आगाह किया कि नशे की लत से जूझ रहे मासूम बच्चे शोषण, शारीरिक हिंसा, मानव तस्करी और अन्य आपराधिक दुर्व्यवहारों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। ऐसे में बाल संरक्षण व्यवस्था का दायरा केवल मेडिकल डी-एडिक्शन या दवाइयों तक सीमित न रहकर उनकी सुरक्षा, पठन-पाठन और करियर को संरक्षित करने वाले सर्वांगीण पुनर्वास पर केंद्रित होना चाहिए।

इलाज के बाद सुरक्षित माहौल और निरंतर सहयोग

सीजेआई सूर्यकांत ने इस बात पर विशेष बल दिया कि नशा मुक्ति केंद्र या अस्पताल से मेडिकल ट्रीटमेंट पूरा हो जाना ही समस्या का अंतिम समाधान नहीं है। उपचार के उपरांत भी बच्चे को दीर्घकालिक मानसिक संबल, नियमित देखभाल और एक भयमुक्त वातावरण की दरकार होती है। यदि उपचार के बाद बच्चा खुद को उपेक्षित या समाज से बहिष्कृत महसूस करेगा, तो उसके दोबारा उसी घातक दलदल में लौटने की आशंका बढ़ जाती है। परिवार, शिक्षण संस्थानों और स्थानीय समाज का यह सामूहिक दायित्व बनता है कि वे ऐसे बच्चों को बिना किसी पूर्वाग्रह के गले लगाएं और उन्हें यह भरोसा दिलाएं कि वे अकेले नहीं हैं।

गरिमा, आत्मसम्मान और साझा सामाजिक जवाबदेही

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि नशे से प्रभावित बच्चों को किसी अपराधी या केवल एक मरीज के चश्मे से देखना अनुचित है। व्यवस्था में उनके मानवीय अधिकारों, आत्मसम्मान और गरिमा की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। वास्तविक कामयाबी तब है जब ऐसा बच्चा पुनः अपनी कक्षा में बैठे और बिना किसी सामाजिक कलंक (Stigma) के सामान्य जीवन जिए।

बिहार की ऐतिहासिक ज्ञान और शिक्षा परंपरा का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि इस विकराल चुनौती का सामना केवल पुलिस, प्रशासन या अदालतों के सहारे नहीं किया जा सकता। राज्य में शराबबंदी के बीच अन्य नशीले पदार्थों के खतरों को देखते हुए माता-पिता, शिक्षक, सिविल सोसायटी और सरकार—सभी को मिलकर सुरक्षा और पुनर्वास का एक मजबूत सुरक्षा घेरा तैयार करना होगा।

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