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प्राकृतिक संतुलन और भ्रातृ-प्रेम की सांस्कृतिक विरासत ‘करम पूजा’

प्रकृति, संस्कृति और कर्म निष्ठा का पावन प्रतीक: करम पर्व की लोक आस्था और सामाजिक चेतना

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Ranchi: भारतीय लोक संस्कृति की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि यहां के पर्व और त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के मूल दर्शन, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और मानवीय संबंधों की प्रगाढ़ता को अभिव्यक्त करते हैं। मध्य और पूर्वी भारत, विशेष रूप से झारखंड, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के अंचलों में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला करम पर्व इसी पावन परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाने वाला यह लोक पर्व प्रकृति पूजा, कृषि संस्कृति, भाई-बहन के पवित्र प्रेम और कर्म की महानता का एक ऐसा अनूठा संगम है, जो आधुनिक दौर में भी मानव समाज को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।
करम पर्व का संपूर्ण दर्शन ‘कर्म’ यानी निष्काम भाव से कार्य करने की भावना पर आधारित है। लोक परंपराओं में यह मान्यता गहराई से रची-बसी है कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने सत्कर्मों से निर्मित होता है। करम राजा, जिन्हें इस पर्व में देवता के रूप में पूजा जाता है, वास्तव में कर्म के ही प्रतीक हैं। जब खरीफ की फसलें खेतों में लहलहाने लगती हैं और चारों ओर हरियाली का आवरण बिछ जाता है, तब कृषक समाज प्रकृति के इस वरदान का आभार व्यक्त करने के लिए करम देव की आराधना करता है। यह पर्व सिखाता है कि बिना मेहनत और पसीने के धरती से अन्न रूपी सोना प्राप्त नहीं किया जा सकता, और इसीलिए कर्म ही मनुष्य का सच्चा धर्म और जीवन का आधार है।
इस पर्व का एक अत्यंत सुंदर और मानवीय पहलू भाई-बहन का पवित्र संबंध है। करम पूजा के अवसर पर बहनें अपने भाइयों की दीर्घायु, सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और सफलता की कामना करती हैं। भाद्रपद एकादशी से कुछ दिन पूर्व ही बहनें बांस की टोकरियों में बालू भरकर उसमें सात प्रकार के अनाज जैसे कुरथी, उरद, गेहूं, जौ, मकई, मूंग और धान बोती हैं, जिसे ‘जावा’ कहा जाता है। यह जावा अंकुरण की प्रक्रिया नई सृष्टि, उर्वरता और खुशहाली का प्रतीक है। बहनें प्रतिदिन जावा को हल्दी के जल से सींचती हैं और पारंपरिक गीतों के साथ उसकी देखभाल करती हैं। पूजा के दिन जब यह जावा पूरी तरह अंकुरित होकर लहलहा उठता है, तो इसे भाइयों को समर्पित किया जाता है। यह परंपरा इस बात का सजीव प्रमाण है कि लोक संस्कृति में कृषि और पारिवारिक संबंधों की प्रगाढ़ता को कितनी सुंदरता से पिरोया गया है।
करम पूजा की पूरी प्रक्रिया प्रकृति संरक्षण की अद्भुत मिसाल पेश करती है। इस दिन गांव के युवक और युवती जंगलों में जाकर पूरे आदर और पवित्रता के साथ करम वृक्ष की डालियों को काट कर लाते हैं। इन डालियों को गांव के अखाड़े या आंगन के बीचों-बीच गाड़कर विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। करम वृक्ष की पूजा केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह जंगलों, पेड़-पौधों और पर्यावरण की रक्षा करने का एक मौन संकल्प है। जिस समय आधुनिक विश्व पर्यावरण संकट, ग्लोबल वार्मिंग और वनों के विनाश से जूझ रहा है, उस दौर में सदियों पुरानी यह जनजातीय और लोक परंपरा दुनिया को प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व बनाकर जीने का संदेश देती है। लोक समाज ने कभी भी प्रकृति को अपने उपभोग की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे माता और देवता का दर्जा देकर उसकी रक्षा की है।
पूजा की रात पूरा वातावरण मांदर, ढाक और नगाड़ों की गूंज से जीवंत हो उठता है। गांव-कस्बों के अखाड़ों में युवा, बुजुर्ग और महिलाएं हाथ में हाथ डालकर पारंपरिक झूमर नृत्य करते हैं। करम गीतों के सुरों में जीवन के विविध रंगों, प्रेम, विरह, कृषि की कठिनाइयों और कर्म के महत्व का अद्भुत वर्णन मिलता है। ये गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये भावी पीढ़ियों तक अपनी सांस्कृतिक विरासत और मौखिक इतिहास को पहुंचाने का एक मजबूत माध्यम भी हैं। गीतों के बोलों में यह स्पष्ट संदेश निहित होता है कि जैसे करम वृक्ष हरा-भरा रहता है और फल-फूल देता है, वैसे ही मनुष्य को भी अपने कर्मों से समाज को समृद्ध और खुशहाल बनाना चाहिए।
करम पूजा की पौराणिक और लोक कथाएं भी कर्म की सर्वोपरिता को रेखांकित करती हैं। करम और धरम नामक दो भाइयों की प्रचलित कथा यह स्पष्ट करती है कि धन-दौलत और अलस्य के अहंकार में डूबकर अपने कर्म को भूल जाने वाला व्यक्ति अंततः दुख और विनाश को प्राप्त होता है। जब तक मनुष्य अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन नहीं करता, तब तक ईश्वर की कृपा भी उसे प्राप्त नहीं हो सकती। जब करम राजा अपने अहंकार को त्यागकर पुनः अपने कर्म के प्रति समर्पित होते हैं, तभी उनके जीवन में सुख और समृद्धि की वापसी होती है। यह कथा आज के भौतिकवादी युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी, क्योंकि यह हमें याद दिलाती है कि श्रम और ईमानदारी ही जीवन की वास्तविक पूंजी है।
करम पर्व केवल एक क्षेत्रीय त्यौहार भर नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता, भ्रातृभाव और सामूहिक सहभागिता का एक महायज्ञ है। इस दिन अमीर-गरीब, ऊंच-नीच के सारे भेद मिट जाते हैं और पूरा समुदाय एक साथ मिलकर अखाड़े में नृत्य करता है और पूजा-अर्चना में भाग लेता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि खुशियां बांटने से बढ़ती हैं और समाज की वास्तविक शक्ति उसकी एकजुटता में ही निहित है।
अंततः, करम पर्व का संदेश आधुनिक समाज के लिए एक मार्गदर्शक दीपक की तरह है। यह पर्व हमें अपनी मिट्टी से जोड़े रखता है, प्रकृति के प्रति हमारी ज़िम्मेदारियों का अहसास कराता है और मानवीय रिश्तों में मिठास बनाए रखने का मार्ग दिखाता है। जब तक समाज में कर्म के प्रति निष्ठा, पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और अपनों के प्रति प्रेम बना रहेगा, तब तक करम पर्व का यह पावन संदेश प्रासंगिक रहेगा। हमें आवश्यकता इस बात की है कि हम इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को न केवल संजोकर रखें, बल्कि इसके मूल दर्शन ‘प्रकृति रक्षा और कर्म निष्ठा’ को अपने व्यावहारिक जीवन में भी पूर्ण रूप से उतारें।
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