Ranchi: राजधानी स्थित प्रेस क्लब में केन्द्रीय सरना समिति और विभिन्न आदिवासी/जनजाति सामाजिक संगठनों ने एक संयुक्त प्रेस वार्ता का आयोजन किया। इस दौरान आदिवासी प्रतिनिधियों ने ईसाई समुदाय द्वारा चर्च और गिरजाघरों में करम देवता को गाड़कर परंपराओं का अपमान करने और जनजातीय संस्कृति के साथ खिलवाड़ करने का गंभीर आरोप लगाया।
प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने ‘खड़िया धर्म और संस्कृति का विश्लेषण’ तथा ‘आदिवासी मिस्सा संग्रह’ जैसी पुस्तकों के अंशों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि वेटिकन विश्व सभा के निर्देशों की आड़ में सरहुल और करम जैसे पवित्र आदिवासी त्योहारों को “ख्रीस्तीय” (ईसाई) ढंग से ढालकर मनाया जा रहा है। आरोप है कि गिरजाघरों में करम देव की डाल को बालू के टीन में खड़ा कर दिखावे की पूजा की जा रही है, जो सरना समाज की रूढ़िवादी आस्था का सीधा अपमान है।
आदिवासी नेताओं ने स्पष्ट किया कि जो लोग पारंपरिक पूजा पद्धति, रीती-रिवाज और संस्कारों का त्याग कर ईसाई बन चुके हैं, उनका आदिवासी आस्था से कोई लेना-देना नहीं रह जाता। वे सिर्फ आदिवासी पहचान का लाभ उठाने के लिए ऐसा ढोंग कर रहे हैं। साथ ही, ईसाई साहित्य में भादो एकादशी की रात होने वाले पारंपरिक सामूहिक नृत्य-संगीत पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करने और इसे “बुरा करम” बताकर समाज से हटाने की वकालत करने पर गहरा रोष व्यक्त किया गया।
इस पूरे मामले को लेकर केंद्रीय सरना समिति ने 16 सितंबर को रांची के उपायुक्त (DC) को ज्ञापन सौंपकर इन गतिविधियों पर अविलंब रोक लगाने की मांग की है। संगठनों ने साफ चेतावनी दी है कि ईसाई अपने त्यौहार मनाने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन यदि आदिवासियों के नाम पर धार्मिक रूपांतरण और संस्कृति से छेड़छाड़ जारी रही, तो पूरे राज्य में इसका पुरजोर विरोध किया जाएगा। प्रेस वार्ता में अध्यक्ष बबलू मुंडा, जगलाल पहान, संदीप उरांव, डॉ. बिरसा उरांव और मेघा उरांव सहित दर्जनों आदिवासी प्रतिनिधि उपस्थित थे।



