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भीख का कटोरा छोड़ कमा रहीं सम्मान, रुला देगी इन महिलाओं की दास्तां

मुख्यमंत्री भिक्षावृत्ति निवारण योजना के तहत 10 जिलों के 10,319 बेघरों को मिला आश्रय; सिलाई-कढ़ाई और खिलौने बनाने का प्रशिक्षण पाकर आत्मनिर्भर बन रहीं महिलाएं।

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Patna: कभी चौराहों, मंदिरों और बाजारों में बेबसी के हाथ फैलाए खड़े लोग आम नजर आते थे- कोई तरस खाकर सिक्के थमा देता, तो कोई नजरें चुराकर आगे बढ़ जाता। लेकिन बिहार में अब इस लाचारी की तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। समाज कल्याण विभाग की ‘मुख्यमंत्री भिक्षावृत्ति निवारण योजना’ ने इन बेसहारा चेहरों को नई जिंदगी दी है। अभियान के तहत सड़कों से रेस्क्यू करने के बाद इन्हें सिर्फ छत और इलाज ही नहीं मिल रहा, बल्कि पहचान पत्र और स्वरोजगार देकर मुख्यधारा से भी जोड़ा जा रहा है।

शांति कुटिर बना नई जिंदगी का ठिकाना

राजधानी पटना के पाटलिपुत्र क्षेत्र में संचालित ‘शांति कुटिर महिला पुनर्वास केंद्र’ की संस्थापक राखी शर्मा के अनुसार, केंद्र की टीमें सड़कों और सार्वजनिक स्थलों से जरूरतमंद व लाचार महिलाओं को रेस्क्यू करती हैं। यहां उनके समुचित इलाज और पोषण का प्रबंध किया जाता है। इसके बाद महिलाओं की रुचि के अनुसार उन्हें सिलाई-कढ़ाई, मिट्टी के कलात्मक खिलौने बनाने और अन्य हस्तशिल्प कार्यों का प्रशिक्षण दिया जाता है। अब तक केंद्र ने 982 जरूरतमंदों को सहारा दिया है, जिनमें से 780 लोगों को स्वास्थ्य लाभ के बाद सुरक्षित रूप से उनके परिवारों से मिलाया जा चुका है।

10 जिलों में विस्तार, 10 हजार से अधिक को मिली छत

यह योजना वर्तमान में बिहार के 10 प्रमुख जिलों—पटना, गया, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, पूर्णिया, भागलपुर, मुंगेर, सहरसा और सारण में व्यापक स्तर पर संचालित हो रही है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, अब तक 10,319 पंजीकृत लाभार्थियों को सेवा कुटिर, शांति कुटिर, वृद्धाश्रम और रैन बसेरों में पक्की छत दी गई है। पुनर्वास के साथ-साथ 610 इच्छुक लाभार्थियों को रोजगार शुरू करने के लिए 10-10 हजार रुपये की आर्थिक सहायता मुहैया कराई गई है। इसके अलावा, शिविर लगाकर इनके जरूरी पहचान पत्र और स्वास्थ्य कार्ड भी बनवाए जा रहे हैं।

जिन्होंने झेली बेबसी, उनकी जुबानी

  • अनीता देवी: “सालों तक सड़कों पर हाथ फैलाकर जिंदगी काटी। शांति कुटिर आने के बाद इलाज मिला और अब मिट्टी के खिलौने व सिलाई का काम सीख चुकी हूं। यहां सम्मान की जिंदगी जी रही हूं।”

  • पार्वती कुमारी: “घरेलू हिंसा के दौरान ससुराल वालों ने खौलता तेल डाल दिया था। बेबस होकर स्टेशन पर भीख मांगने लगी। 2017 में पुनर्वास केंद्र की टीम ने मेरा इलाज कराया और आज मैं इसी केंद्र में सहयोगकर्ता के रूप में कार्य कर रही हूं।”

  • सुषमा श्रीवास्तव: “परिवार वालों ने स्टेशन पर लावारिस छोड़ दिया था। महीनों भटकने के बाद सेंटर ने मुझे सहारा दिया। आज मैं भिक्षावृत्ति छोड़कर केंद्र में रसोईया के रूप में गरिमापूर्ण जीवन बिता रही हूं।”

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