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रांची: झारखंड में अवैध खनन और प्रशासनिक शक्तियों के कथित दुरुपयोग से जुड़े एक बेहद गंभीर और दिलचस्प मामले में झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता अशोक सिंह की याचिका पर सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को सूचित किया गया कि विवादित गाड़ी को तीसरे पक्ष से वापस ले लिया गया है और वास्तविक मालिक (याचिकाकर्ता) को इसे वापस ले जाने के लिए नोटिस भी भेजा जा चुका है, परंतु वे अभी तक वाहन लेने नहीं पहुंचे हैं।
अदालत में राज्य सरकार का पक्ष अपर महाधिवक्ता आशुतोष आनंद और अधिवक्ता शाहबाज अख्तर ने मजबूती से रखा। इससे पहले हुई सुनवाइयों में हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को मामले के निपटारे के लिए एक महीने का समय दिया था और मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से इस पूरे प्रकरण की निगरानी करने का निर्देश दिया था। मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लातेहार के तत्कालीन उपायुक्त (डीसी) भोर सिंह यादव को पूर्व में अदालत के समक्ष वर्चुअल रूप से पेश होना पड़ा था, जहां खंडपीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की थी कि उनके गलत फैसलों के कारण जो विकट समस्या पैदा हुई, उसका समाधान अब तक क्यों नहीं निकाला गया। इस मामले की सुनवाई के दौरान लातेहार के वर्तमान उपायुक्त संदीप कुमार भी अदालत में सशरीर उपस्थित हुए थे।
पूरा मामला लातेहार जिले के बालूमाथ में अवैध खनन के परिवहन में पकड़े गए एक हाईवा (डंपर) की जब्ती और उसकी जल्दबाजी में की गई नीलामी से जुड़ा है। आरोप है कि जब वाहन की जब्ती से संबंधित रिवीजन याचिका सक्षम प्राधिकार के समक्ष लंबित थी, तब लातेहार के तत्कालीन डीसी भोर सिंह यादव ने नियमों को ताक पर रखकर बिना मालिक को अपना पक्ष रखने का मौका दिए, आनन-फानन में गाड़ी को बहुत ही सस्ते दाम पर नीलाम कर किसी तीसरे पक्ष को हस्तांतरित कर दिया था।
हैरानी की बात यह है कि याचिकाकर्ता अशोक सिंह का यह हाईवा बिहार के गया जिले से चोरी हो गया था, जिसकी बाकायदा प्राथमिकी (FIR) भी दर्ज कराई गई थी। चोरी होने के बाद यह वाहन बालूमाथ में अवैध बालू या खनिज ढोते पकड़ा गया। जब असली मालिक को भनक लगी, तब तक प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही के कारण उनकी गाड़ी बेची जा चुकी थी। अब हाईकोर्ट के सुरक्षित फैसले पर सबकी नजरें टिकी हैं कि इस प्रशासनिक चूक पर क्या निर्णय आता है।

