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रांची: बोकारो जिले के चास प्रखंड स्थित तेतुलिया गांव की 103 एकड़ बहुमूल्य भूमि पर अवैध कब्जे और फर्जी जमाबंदी से जुड़े एक बेहद चर्चित मामले में झारखंड हाईकोर्ट से व्यवसायी पुनीत कुमार अग्रवाल को बड़ी अंतरिम राहत मिली है। न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालत में चल रहे मुकदमे (ट्रायल) की आगे की सभी कार्यवाहियों पर अगले आदेश तक अंतरिम रोक लगा दी है। इसके साथ ही, अदालत ने इस पूरे प्रकरण में राज्य सरकार को अपना विस्तृत पक्ष रखते हुए जवाब दाखिल करने का कड़ा निर्देश जारी किया है।
दरअसल, व्यवसायी पुनीत कुमार अग्रवाल ने झारखंड हाईकोर्ट में एक क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की थी। इस याचिका के माध्यम से उन्होंने निचली अदालत द्वारा उनके खिलाफ आरोप तय (चार्ज फ्रेम) किए जाने के आदेश को कानूनी तौर पर चुनौती दी थी। मामले की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों का प्रथम दृष्टया अवलोकन करने के बाद, हाईकोर्ट ने निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगाने का यह आदेश पारित किया।
इस पूरे जमीन घोटाले की जांच अपराध अनुसंधान विभाग (CID) कर रही है, जिसने कांड संख्या 4\2025 के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी। सीआईडी द्वारा अनुसंधान पूरा किए जाने के बाद ही निचली अदालत ने आरोपितों के खिलाफ आरोप तय किए थे। अभियोजन के अनुसार, यह पूरा घोटाला साल 2012 का है, जब फर्जी दस्तावेजों और कूटरचित कागजातों के सहारे तेतुलिया गांव की करीब 103 एकड़ सरकारी जमीन की अवैध रूप से जमाबंदी किसी अन्य के नाम पर कायम कर दी गई थी।
सीआईडी की गहन जांच में तत्कालीन अंचल अधिकारी (सीओ) की भूमिका पूरी तरह से संदिग्ध पाई गई थी, जिसके बाद कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए राज्य सरकार ने उन्हें पहले ही सेवा से बर्खास्त कर दिया था। इस महाघोटाले में केवल अंचल अधिकारी ही नहीं, बल्कि तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ), भूमि सुधार उपसमाहर्ता (डीएलआरओ), अंचल निरीक्षक (सीआई), राजस्व कर्मचारी और अमीन की मिलीभगत भी जांच के दायरे में है।
विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार, सतनपुर और तेतुलिया क्षेत्र की यह विवादित पहाड़ एवं वन भूमि राज्य सरकार ने बहुत पहले बोकारो इस्पात संयंत्र (बीएसएल) को आवंटित की थी। चूंकि, बीएसएल ने इस जमीन का उपयोग नहीं किया, इसलिए यह भूखंड लंबे समय तक खाली पड़ा रहा। वर्ष 1980 और 2013 के रिवीजनल सर्वे के दौरान भी किसी भी रैयत या व्यक्ति ने इस जमीन पर अपने मालिकाना हक का कोई दावा नहीं किया था। इसके बावजूद, भू-माफियाओं और भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ से 2012 में इसे निजी हाथों में सौंपने का खेल रचा गया। फिलहाल, हाईकोर्ट के नए निर्देश के बाद निचली अदालत में इस मामले की फाइलें बंद रहेंगी और राज्य सरकार के जवाब के बाद ही अगली सुनवाई होगी।

