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Ranchi: मानव अधिकार और समावेशी विकास विषय पर सोमवार को रांची के ओयना गांव स्थित डायमंड सिटी सभागार में ईस्टर्न इंडिया डेवलपमेंट फोरम के तत्वावधान में राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, प्रशासनिक अधिकारियों और बुद्धिजीवियों ने मानवाधिकारों की वर्तमान स्थिति, सामाजिक न्याय तथा समावेशी विकास जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक चर्चा की।
कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य एवं पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विद्युत रंजन सारंगी, आयकर आयुक्त निशा उरांव, ईस्टर्न इंडिया डेवलपमेंट फोरम के अध्यक्ष संजीव कुमार, दिया सेवा संगठन की सचिव डॉ. सीता कुमारी, समाजसेवी मनोज जैना और कार्यक्रम संयोजक अर्णव झा ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना से होगा समृद्ध भारत
मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति विद्युत रंजन सारंगी ने अपने संबोधन में कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक और खुशहाल जीवन जीने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन संस्कृति हमेशा मानव कल्याण और समावेश की पक्षधर रही है। “वसुधैव कुटुंबकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर और सम्मान मिले।
उन्होंने कहा कि मानवाधिकार केवल कानूनी विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है। समाज के कमजोर और वंचित वर्गों तक विकास की रोशनी पहुंचाना ही लोकतंत्र की वास्तविक पहचान है।
सामाजिक न्याय और भागीदारी पर दिया जोर
विशिष्ट अतिथि आयकर आयुक्त निशा उरांव ने कहा कि मानव विकास सूचकांक केवल आंकड़ों का विषय नहीं होना चाहिए। वास्तविक विकास वही है, जिसमें सामाजिक न्याय, समान अवसर और सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित हो। उन्होंने आदिवासी और मूलवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और विरासत को देश की अमूल्य धरोहर बताते हुए कहा कि इन मूल्यों के संरक्षण की सामूहिक जिम्मेदारी समाज की है।
ईस्टर्न इंडिया डेवलपमेंट फोरम के अध्यक्ष संजीव कुमार ने कहा कि संस्था पूर्वी भारत में उद्योग, शिक्षा, सामाजिक उत्थान और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए लगातार कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार और समाज के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर ही समावेशी विकास का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
दिया सेवा संगठन की सचिव डॉ. सीता कुमारी ने कहा कि विकास तभी सार्थक माना जाएगा, जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक उसके अधिकार और सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचे। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
मानवाधिकार संरक्षण के लिए जागरूकता जरूरी
समाजसेवी मनोज जैना ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 1948 में मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के बाद दुनिया भर में अधिकारों की सुरक्षा को लेकर नई सोच विकसित हुई। भारत में वर्ष 1993 में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम लागू किया गया, लेकिन आज भी मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं चिंता का विषय बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है।
सेमिनार के दौरान समाज, खेल, पत्रकारिता और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले कई व्यक्तित्वों को सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वालों में राष्ट्रीय खिलाड़ी अनीता कुमारी, आयकर आयुक्त निशा उरांव, नरेंद्र कुमार, वरिष्ठ पत्रकार कविलाश कुमार बैठा, नेवरी के मुखिया साधो उरांव, मनीष वर्मा, ए.के. राय, पी.पी. सरफराज अली, मंटू महांती और श्रीपार्थो सहित कई अन्य विशिष्ट व्यक्तित्व शामिल रहे।
कार्यक्रम का समापन अर्णव सिन्हा के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। इस अवसर पर देश के विभिन्न राज्यों से आए सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और गणमान्य नागरिकों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

