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रांची: झारखंड में जमीन का मुद्दा हमेशा से बेहद संवेदनशील और राजनीतिक रूप से गरमाया रहा है। हाल ही में झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग को लगाई गई कड़ी फटकार के बाद एक बड़ा सवाल जनता के बीच तैर रहा है-आखिर झारखंड में साल 1980 से शुरू हुआ भूमि सर्वेक्षण (Land Survey) आज 2026 में भी अधूरा क्यों है? करीब 46 साल बीत जाने के बाद भी राज्य के बहुसंख्यक जिलों में यह प्रक्रिया मुकम्मल क्यों नहीं हो सकी है? इस कछुआ गति के कारण जहां एक ओर राज्य में आपराधिक वारदातों और जमीन संबंधी मुकदमों (Land Disputes) का अंबार लग गया है, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक मशीनरी पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आइए विस्तार से समझते हैं कि झारखंड में जमीन सर्वे के इतिहास, इसके लटकने के मुख्य कारणों और इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों की पूरी कहानी क्या है।
1. भूमि सर्वेक्षण का ऐतिहासिक सफर: 1932 से 1980 तक
झारखंड के भौगोलिक और सामाजिक ढांचे को समझने के लिए इसके भूमि इतिहास को जानना जरूरी है। अविभाजित बिहार (और वर्तमान झारखंड) के इस आदिवासी बहुल क्षेत्र में आखिरी बार सबसे व्यापक, प्रामाणिक और व्यवस्थित भूमि सर्वेक्षण ब्रिटिश शासनकाल के दौरान साल 1932 में पूरा हुआ था। यही कारण है कि आज भी राज्य की राजनीति और स्थानीयता (Domicile Policy) के निर्धारण में ‘1932 का खतियान’ एक सबसे बड़ा और निर्णायक दस्तावेज माना जाता है।
समय के साथ परिवारों का विस्तार हुआ, जमीनें बंटीं, जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ और जमीनों की प्रकृति (कृषि से आवासीय या व्यावसायिक) में भारी बदलाव आया। इन बदलावों को सरकारी दस्तावेजों में दर्ज करने और जमीनी रिकॉर्ड को अपडेट करने के लिए साल 1980 में एकीकृत बिहार सरकार के समय दोबारा सर्वेक्षण की प्रक्रिया शुरू की गई थी। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि चार दशक से अधिक का समय बीत जाने और एक नए राज्य (झारखंड) का गठन हो जाने के बाद भी यह प्रक्रिया अंतिम छोर तक नहीं पहुंच सकी है।
2. आखिर क्यों थमी रही सर्वे की रफ्तार?
झारखंड में भूमि सर्वेक्षण के दशकों तक लटके रहने के पीछे कोई एक कारण नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक उदासीनता, तकनीकी खामियों और जटिल कानूनों का एक मिला-जुला नतीजा है:
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अधिकारियों और कर्मियों का भारी टोटा: राजस्व विभाग में अंचल अधिकारी, राजस्व उपनिरीक्षक (कर्मचारी), अमीन और सर्वेक्षकों के हजारों पद सालों से खाली पड़े रहे हैं। जब जमीनी स्तर पर नापी करने और रिकॉर्ड का मिलान करने वाले कर्मचारी ही नहीं होंगे, तो सर्वे का काम आगे कैसे बढ़ेगा?
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तकनीकी संसाधनों की कमी और पुरानी व्यवस्था: 1980 और 90 के दशक में सर्वे का काम पूरी तरह से पारंपरिक और मैन्युअल (कागजी) तरीके से होता था। नक्शों को हाथ से बनाना और कड़ियों (चैन) से जमीन मापना बेहद समय लेने वाला काम था। हाल के वर्षों में डिजिटल और सैटेलाइट सर्वे (Digital & Drone Survey) को अपनाने की कोशिश की गई है, लेकिन इसकी रफ्तार भी उम्मीद के मुताबिक नहीं रही।
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भौगोलिक और जनजातीय भू-कानूनों की जटिलता: झारखंड में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) और संताल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act) लागू हैं। इन कानूनों के तहत आदिवासियों की जमीन के हस्तांतरण पर कई तरह के कड़े प्रतिबंध हैं। इसके अलावा, राज्य में बड़े पैमाने पर ‘गैर-मजरूआ’ (सरकारी), ‘खास महल’ और ‘बकास्त’ जमीनें हैं, जिनके मालिकाना हक को लेकर इतने पेंच हैं कि सर्वे की टीम अक्सर कानूनी विवादों में फंस जाती है।
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रिकॉर्ड्स का रख-रखाव और भ्रष्टाचार: अंचल कार्यालयों में पुराने रिकॉर्ड्स या तो फटे-पुराने हाल में हैं या गायब हो चुके हैं। भू-माफियाओं और भ्रष्ट तंत्र के गठजोड़ ने भी जानबूझकर सर्वे की प्रक्रिया को धीमा रखा, क्योंकि रिकॉर्ड साफ होने पर अवैध कब्जों और फर्जी डीड (Fake Deeds) का पर्दाफाश होने का डर था।
3. अधूरे सर्वे का राज्य पर क्या असर पड़ा?
जमीन का सर्वे अधूरा रहने की कीमत झारखंड की आम जनता और यहां के विकास को चुकानी पड़ रही है:
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भू-विवादों और अपराधों में बेतहाशा बढ़ोतरी: झारखंड पुलिस और अदालती आंकड़ों के मुताबिक, ग्रामीण और शहरी इलाकों में होने वाली हत्याओं और हिंसक झड़पों के पीछे 70 प्रतिशत से अधिक कारण जमीन के आपसी विवाद होते हैं। सगे भाई-बहन और पड़ोसी सिर्फ इसलिए सालों तक मुकदमों में फंसे रहते हैं क्योंकि सरकारी नक्शे और खतियान अपडेटेड नहीं हैं।
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विकास कार्यों में अड़चन और राजस्व की हानि: जब भी सरकार को किसी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट (जैसे सड़क, हाईवे, डैम या उद्योग) के लिए जमीन का अधिग्रहण (Land Acquisition) करना होता है, तो असली मालिक की पहचान करना और मुआवजा बांटना एक टेढ़ी खीर बन जाता है। इससे परियोजनाएं सालों लेट हो जाती हैं और लागत बढ़ जाती है।
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निवेशकों में अविश्वास का माहौल: कोई भी बड़ा औद्योगिक घराना या निवेशक झारखंड में पूंजी लगाने से पहले कतराता है, क्योंकि यहां जमीन की टाइटिल डीड (Title Deed) को लेकर हमेशा अनिश्चितता बनी रहती है।
4. वर्तमान स्थिति और हाई कोर्ट का कड़ा रुख
गोकुल चंद द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने सरकार के ढीले रवैये पर गहरी नाराजगी जताई है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि जमीन विवादों को खत्म करने के लिए इस सर्वे का पूरा होना अनिवार्य है।
हालांकि, राज्य सरकार ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि अब स्थिति में सुधार हो रहा है। आधुनिक तकनीकों का सहारा लेकर काम को गति दी जा रही है। सरकार के मुताबिक, लातेहार और लोहरदगा जिलों में भूमि सर्वेक्षण का कार्य पूरी तरह से संपन्न हो चुका है, जबकि राज्य के अन्य 22 जिलों में यह काम अलग-अलग चरणों (जैसे किस्तवार, खानापुरी और तस्दीक) में है। अदालत ने अब राजस्व सचिव से खुद हलफनामा मांगते हुए सभी जिलों की अंतिम ‘डेडलाइन’ (समय-सीमा) प्रस्तुत करने को कहा है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह काम जल्द से जल्द खत्म हो।
झारखंड में भूमि सर्वेक्षण का पूरा होना केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह राज्य की आर्थिक प्रगति, सामाजिक न्याय और कानून व्यवस्था को सुदृढ़ करने की पहली शर्त है। डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) के तहत अब उम्मीद की जा रही है कि ऑनलाइन म्यूटेशन और जियो-रेफरेंसिंग के जरिए इस 46 साल पुराने अधूरे काम को तार्किक अंजाम तक पहुंचाया जाएगा, जिससे झारखंड के रैयतों (किसानों/जमीन मालिकों) को उनका वास्तविक अधिकार मिल सके।

