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Mumbai: महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना एक बार फिर संभावित टूट की चर्चाओं के कारण सुर्खियों में है। खबरें हैं कि शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट का समर्थन कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह पार्टी के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ माना जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि शिवसेना अपने गठन के बाद से कई बार ऐसे संकटों का सामना कर चुकी है, लेकिन हर बार किसी न किसी रूप में खुद को पुनर्गठित भी करती रही है।
पहली बड़ी टूट: बंदू शिंगरे का विद्रोह
शिवसेना के इतिहास में पहली उल्लेखनीय बगावत 1970 के दशक में सामने आई थी। पार्टी संस्थापक बाल ठाकरे और स्थानीय नेता बंदू शिंगरे के बीच मतभेद बढ़ने के बाद शिंगरे ने “प्रति शिवसेना” नाम से अलग संगठन बनाया। हालांकि यह प्रयास ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ सका और शिवसेना की राजनीतिक ताकत पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा।
दूसरी बड़ी टूट: छगन भुजबल की बगावत
दिसंबर 1991 में वरिष्ठ नेता छगन भुजबल ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उस समय वह महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे। भुजबल ने दावा किया था कि उन्हें बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन प्राप्त है। यह पहली बार था जब पार्टी के भीतर इतने बड़े कद के नेता ने खुलकर विरोध का रास्ता चुना।
तीसरी बड़ी टूट: नारायण राणे का अलग होना
साल 2005 में पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने शिवसेना छोड़ दी। राजनीतिक जानकारों के अनुसार पार्टी में उत्तराधिकार को लेकर बढ़ती असहमति इसकी प्रमुख वजह थी। राणे ने कांग्रेस का दामन थाम लिया और उनके जाने को उस दौर में शिवसेना के लिए बड़ा झटका माना गया।
चौथी बड़ी टूट: राज ठाकरे ने बनाई नई पार्टी
साल 2006 में बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने भी शिवसेना से अलग राह चुन ली। उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का गठन किया। हालांकि उनके साथ बड़ी संख्या में विधायक नहीं गए, लेकिन संगठन और कार्यकर्ताओं के स्तर पर इसका असर व्यापक रहा। बाद में मनसे ने महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।
पांचवीं और सबसे बड़ी टूट: एकनाथ शिंदे की बगावत
साल 2022 शिवसेना के इतिहास का सबसे निर्णायक वर्ष साबित हुआ। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक उद्धव ठाकरे के नेतृत्व के खिलाफ खड़े हो गए। इस बगावत के चलते महाविकास अघाड़ी सरकार गिर गई और महाराष्ट्र की राजनीति पूरी तरह बदल गई।
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम “शिवसेना” और उसका पारंपरिक चुनाव चिह्न “धनुष-बाण” शिंदे गुट को आवंटित कर दिया। इसके बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट को शिवसेना (यूबीटी) के नाम से नई राजनीतिक पहचान बनानी पड़ी।
छठी टूट की चर्चा: 2026 में नया संकट
अब वर्ष 2026 में शिवसेना (यूबीटी) के सामने एक और चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी के कुछ सांसद शिंदे गुट का समर्थन कर सकते हैं। हालांकि अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
यदि यह राजनीतिक घटनाक्रम सच साबित होता है, तो लोकसभा में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी की ताकत और घट सकती है। इससे महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरण बनने की संभावना भी बढ़ जाएगी।
पिछले पांच दशकों का इतिहास बताता है कि शिवसेना कई बार टूट और बगावत का सामना कर चुकी है। लेकिन हर संकट के बाद पार्टी ने खुद को नए रूप में खड़ा करने की कोशिश की है। अब देखना यह होगा कि 2026 का यह संभावित संकट शिवसेना (यूबीटी) की राजनीति को किस दिशा में ले जाता है।

