अपनी भाषा चुनेें :
बटन दबाकर थोड़ा इंतज़ार करें...
रांची: आगामी लोकसभा और विधानसभा परिसीमन (Delimitation) को लेकर झारखंड के आदिवासी समाज ने गहरी चिंता व्यक्त की है। राज्य के विभिन्न आदिवासी संगठनों ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए लामबंदी शुरू कर दी है। इसी कड़ी में “परिसीमन का आदिवासी समाज पर प्रभाव” विषय को लेकर आगामी 31 मई को रांची प्रेस क्लब में एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक बैठक और सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है।
इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के आयोजक शशि पन्ना और अनिल अमिताभ पन्ना ने शुक्रवार को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इस संबंध में विस्तृत जानकारी साझा की। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि झारखंड के आदिवासी समाज को किसी भी परिस्थिति में आदिवासी आरक्षित सीटों (Reserved Seats) में कोई भी कटौती स्वीकार नहीं की जाएगी। इसके साथ ही उन्होंने कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि यदि सरकार या परिसीमन आयोग द्वारा उनकी मांगों और चिंताओं की अनदेखी की गई, तो पूरे राज्य में एक व्यापक और उग्र आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी।
आयोजकों द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, इस रणनीतिक बैठक को सफल और प्रभावी बनाने के लिए झारखंड के सभी 24 जिलों से आदिवासी समाज के प्रमुख सामाजिक अगुआ, बुद्धिजीवी, प्रख्यात अधिवक्ता, शिक्षाविद्, छात्र-युवा प्रतिनिधि और प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता राजधानी रांची पहुंच रहे हैं।
विवाद और चिंता की मुख्य वजह को स्पष्ट करते हुए शशि पन्ना ने बताया कि यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाकर परिसीमन को लागू किया गया, और इस प्रक्रिया में झारखंड की सामाजिक, सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक परिस्थितियों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया, तो राज्य में आदिवासी आरक्षित सीटों की संख्या में भारी कमी आ सकती है। अगर ऐसा हुआ, तो आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और उनके विशेष संवैधानिक अधिकारों पर सीधा और प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिससे उनका नेतृत्व कमजोर हो जाएगा।
प्रेस क्लब में होने वाली इस बैठक के दौरान मुख्य रूप से परिसीमन के संभावित खतरों और प्रभावों, वर्तमान आरक्षित सीटों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, राज्य की राजनीति में आदिवासियों की समुचित भागीदारी बनाए रखने और भविष्य के जन-आंदोलन की रणनीति जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दों पर विस्तार से विमर्श किया जाएगा।

