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देहरादून की हरियाली पर ‘डेथ वारंट’: 20 हजार पेड़ों को काटना होगा?

Dehradun (Uttarakhand): उत्तराखंड की वादियों में साल के पेड़ों का अपना एक अलग गौरव है, लेकिन आज यही गौरव खतरे में है। ‘होपलो’ (Hoplo) नाम के एक खतरनाक कीट ने देहरादून के वनों पर हमला बोल दिया है। यह कीट साल के मजबूत पेड़ों को

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Dehradun (Uttarakhand): उत्तराखंड की वादियों में साल के पेड़ों का अपना एक अलग गौरव है, लेकिन आज यही गौरव खतरे में है। ‘होपलो’ (Hoplo) नाम के एक खतरनाक कीट ने देहरादून के वनों पर हमला बोल दिया है। यह कीट साल के मजबूत पेड़ों को भीतर से छलनी कर रहा है, जिसके कारण अब वन विभाग को करीब 20,000 पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलानी पड़ सकती है। अगर समय रहते इन्हें नहीं हटाया गया, तो संक्रमण पूरे जंगल को अपनी चपेट में ले लेगा।

कैसे काम करता है यह ‘साइलेंट किलर’?

वैज्ञानिकों के अनुसार, होपलो कीट सबसे पहले पेड़ की छाल में छेद कर अंडे देता है। इन अंडों से निकलने वाले लार्वा पेड़ के तने के भीतर सुरंग बना लेते हैं। इससे पेड़ के भीतर पानी और पोषक तत्वों का बहाव रुक जाता है। नतीजा यह होता है कि बाहर से हरा-भरा दिखने वाला पेड़ ऊपर से सूखने लगता है और हल्का सा तूफान आने पर ताश के पत्तों की तरह गिर जाता है। पेड़ के नीचे गिरा बुरादा और तने से रिसता रस इस संक्रमण का सबसे बड़ा लक्षण है।

वन प्रभागों की स्थिति (एक नज़र में):

वन प्रभाग                   प्रभावित पेड़ों की संख्या

देहरादून वन प्रभाग         12,000

कालसी प्रभाग                  5,000

मसूरी प्रभाग                    3,000+

FRI ने संभाली कमान, लेकिन इलाज नहीं आसान

वन विभाग ने इस संकट से निपटने के लिए वन अनुसंधान संस्थान (FRI) के विशेषज्ञों से मदद मांगी है। वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. अरुण प्रताप ने स्पष्ट किया है कि होपलो का कोई ठोस रासायनिक उपचार नहीं है। फिलहाल ‘कंटेनमेंट फेलिंग’ यानी संक्रमित पेड़ों को काटकर जंगल से बाहर निकालना ही एकमात्र विकल्प है।

बचाव के लिए अपनाई जा रही तकनीक:

  • ट्रैप ट्री मेथड: कुछ प्रभावित पेड़ों को काटकर उन्हें चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, ताकि कीट आकर्षित होकर फंस जाएं। इससे 70% तक सफलता मिलती है।

  • कीटनाशक पेस्टिंग: कम संक्रमित पेड़ों के तने पर विशेष कीटनाशक लेप लगाया जा रहा है।

  • जंगल की सफाई: सूखे पत्तों और टूटी टहनियों को हटाया जा रहा है ताकि कीटों को प्रजनन का स्थान न मिले।

वन विभाग के अनुसार, हर साल औसतन 2,000 पेड़ इस कीट की वजह से काटे जाते हैं, लेकिन इस बार प्रकोप सामान्य से काफी अधिक है। देहरादून की फिजाओं में साल के वनों की खुशबू बनाए रखने के लिए यह विभाग की अब तक की सबसे बड़ी लड़ाई मानी जा रही है।

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