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Home»#Trending»मुख्यमंत्री को पत्र लिख नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक नियुक्ति प्रक्रिया रद्द करने की मांग
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मुख्यमंत्री को पत्र लिख नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक नियुक्ति प्रक्रिया रद्द करने की मांग

By Samsul HaqueFebruary 7, 20254 Mins Read
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रांची। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) के राज्य उपाध्यक्ष अमन अहमद ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से रांची विश्वविद्यालय में हो रहे नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक नियुक्ति प्रक्रिया को अविलंब रद्द करने का आग्रह किया है। इस बाबत उन्होंने शुक्रवार 7 फरवरी 2025 को मुख्यमंत्री को मांग पत्र देते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि रांची विश्विद्यालय द्वारा नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति प्रक्रिया में अबुआ सरकार की संकल्पना की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही है। दरअसल, सहायक प्राध्यापक नियुक्ति प्रक्रिया झारखंड लोक सेवा आयाेग (JPSC) द्वारा आहुत हाेनी चाहिए किंतु आयोग में अध्यक्ष एवं सदस्य समेत कई पदाधिकारी का पद रिक्त है। उच्च शिक्षा प्रभावित नहीं हो इसलिए सरकार ने यह जिम्मेवारी विश्वविद्यालय को दी और नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक नियुक्ति प्रक्रिया संचालित करने को कहा। इस नियुक्ति प्रक्रिया में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की जिस नियमावली को अपनाया गया है, उससे राज्यभर के आदिवासी-मूलवासी योग्य अभ्यर्थी नियुक्ति प्रक्रिया से वंचित रह गए हैं। उन्हें दस्तावेज सत्यापन तक के लिए आमंत्रित नहीं किया गया हैै। सभी विषयों में राज्य के बाहर के 97 फीसद अभ्यर्थी को नियुक्त किया जा रहा है। जबकि होना यह चाहिए कि UGC के निर्देश पर JPSC ने सहायक प्राध्यापक नियुक्ति के लिए जो नियमावली बनाकर सरकार को भेेजा था, उसके आधार पर राज्य में नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक नियुक्ति प्रक्रिया संचालित होनी चाहिए किंतु झारखंड के ब्यूरोक्रेसी आंख बंद कर झारखंड की प्रतिभा को कुचलने का निर्णय ले चुकी है। इसी का परिणाम है कि रांची विश्वविद्यालय में हो रही नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक नियुक्ति प्रक्रिया में 97 फीसद बाहरियों काे योग्य मानकर स्थानीय आदिवासी-मूलवासी योग्य अभ्यर्थी को दरकिनार कर उन्हें नियुक्ति से कोसों दूर कर दिया गया है।

JPSC द्वारा निर्मित नियमावली के तहत हो नियुक्ति प्रक्रिया

राज्य उपाध्यक्ष अमन अहमद ने पत्र में कहा है इस नियुक्ति में यूजीसी की अहर्ता सम्बन्धी नियमावली का अक्षरसः अनुसरण किया जा रहा है जबकि यूजीसी ने स्वयं ही राज्य सरकार एवं राज्य विश्वविद्यालयों से कहा है कि अपने राज्य में संचालित विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति हेतु राज्य लोक सेवा आयोग नियुक्ति नियमावली बना सकती है और इसी नियमावली से नियुक्ति की जानी चाहिए। इसके तहत झारखंड लोक सेवा आयोग ने नियुक्ति नियमावली बनाई और अनुसरण हेतु राज्य सरकार को भेज दिया। चूकि वर्तमान में झारखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों का पद रिक्त है, कई पदाधिकारी का भी पद रिक्त है और स्थाई नियुक्ति नहीं हो रही है इसलिए सरकार को अनुबंध आधारित नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति करनी पड़ रही है लेकिन झारखंड का ब्यूरोक्रेसी स्थानीय आदिवासी एवं मूलवासी की भावनाओं को दरकिनार कर जेपीएससी द्वारा निर्मित नियमावली को नहीं मानकर यूजीसी की नियमावली के तहत अनुबंध आधारित नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति राज्य के 8 विश्वविद्यालय में कर रही है। रांची विश्वविद्यालय की बात करें तो केवल इस विश्वविद्यालय में यूजीसी की इस नियमावली से 97 % अभ्यर्थी राज्य से बाहर के हैं जिनका शैक्षणिक दस्तावेज का सत्यापन किया जा रहा है। इस नियुक्ति में झारखंड के आदिवासी मूलवासी अभ्यर्थी बाहर हो जा रहे हैं, जिसकी काेई चिंता यहां के ब्यूरोक्रेसी को नहीं है।

कुलपति के रिश्तेदार का चयन ईडब्ल्यूएस कैटेगरी में

संगठन ने मुख्यमंत्री से मांग करते हुए कहा है झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा तैयार नियमावली के तहत ही यह नियुक्ति हो अन्यथा इस नियुक्ति को पूर्णतः रद्द कर दिया जाए ताकि स्थानीय अभ्यर्थियों को नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक नियुक्ति में उचित अवसर मिल सके। संगठन ने इस नियुक्ति में हो रही अन्य गड़बड़ियों की ओर भी ध्यान आकर्षित कराया है। कुलपति के रिश्तेदार का चयन ईडब्ल्यूएस कैटेगरी में किया गया है जबकि वह झारखंड से नहीं बल्कि मुजफ्फरपुर की निवासी है। जब विश्वविद्यालय का कुलपति ही अपने रिश्तेदार को सहायक प्राध्यापक बनाने के लिए नियमों को तोड़ मरोड़ सकता है तो यह कैसे कहा जाएगा कि यहां के आदिवासी-मूलवासियों को इस नियुक्ति में उचित अवसर प्रदान किया जाएगा। यह नियुक्ति 100 फीसद सेटिंग-गेटिंग का है, जिससे स्थानीय आदिवासी मूलवासी को नौकरी से वंचित रखा जाएगा और राज्य के बाहर के अभ्यर्थियों को नौकरी के रूप में गुलाबों का बिस्तर दे दिया जाएगा। माननीय उच्च न्यायालय झारखंड द्वारा ये स्पष्ट कहा गया है कि भविष्य में किसी भी विश्वविद्यालय में गेस्ट, अनुबंध इत्यादि जैसी नियुक्ति प्रक्रिया नहीं किया जाए, क्योंकि इससे झारखंड की जनता से वसूला गया करदाताओं का पैसा बर्बाद किया जा रहा है और इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। रांची विश्वविद्यालय द्वारा नीड बेस्ड साक्षात्कार एवं नियुक्ति प्रक्रिया ये दर्शाता है कि माननीय उच्च न्यायालय झारखंड की आदेश की अहवेलना भी की जा रही है। इसलिए भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन माननीय मुख्यमंत्री महोदय से याचना पत्र के माध्यम से यह मांग करती है कि उक्त नियुक्ति प्रक्रिया को अविलंब स्थगित कर नियुक्ति को पूर्णत: रद्द किया जाए ताकि स्थानीय आदिवासी मूलवासी अभ्यर्थियों को नौकरी में उचित अवसर मिल सके और झारखंड के करदाताओं के साथ न्याय हो सके।

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