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नेपाल में ‘हिंदू राष्ट्र’ की गूंज; राजशाही की वापसी पर छिड़ा सियासी महायुद्ध

काठमांडू: हिमालय की गोद में बसे देश नेपाल में मार्च 2026 के आम चुनावों की आहट के साथ ही सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। मौजूदा प्रधानमंत्री सुशीला कार्की और पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली की हालिया मुलाकात ने देश में नई राजनीतिक

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काठमांडू: हिमालय की गोद में बसे देश नेपाल में मार्च 2026 के आम चुनावों की आहट के साथ ही सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। मौजूदा प्रधानमंत्री सुशीला कार्की और पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली की हालिया मुलाकात ने देश में नई राजनीतिक अटकलों को जन्म दे दिया है। लेकिन इन सबसे परे, नेपाल आज एक बुनियादी वैचारिक लड़ाई के मुहाने पर खड़ा है— क्या नेपाल को वापस अपनी पुरानी पहचान ‘हिंदू राष्ट्र’ की ओर लौटना चाहिए या वह धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र बना रहे? राजशाही की वापसी की मांग अब बंद कमरों से निकलकर काठमांडू की सड़कों तक पहुंच गई है।

“राजशाही एक मृत शरीर है”; बाबूराम भट्टराई का दिल्ली में बड़ा बयान

नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने हाल ही में दिल्ली दौरे के दौरान कड़े शब्दों में कहा कि राजशाही अब एक “मृत शरीर” के समान है और नेपाल कभी खुद को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं करेगा। उनके अनुसार, 1996 से 2006 तक चले लंबे माओवादी संघर्ष और 2015 के संविधान ने नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष और संघीय गणराज्य के रूप में स्थायी रूप से परिभाषित कर दिया है। भट्टराई का मानना है कि जो लोग राजतंत्र की बात कर रहे हैं, वे इतिहास को पीछे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।

अस्थिरता और भ्रष्टाचार से मोहभंग; क्यों उठ रही है राजतंत्र की मांग?

भट्टराई के दावों के विपरीत नेपाल की जमीनी हकीकत काफी पेचीदा है। पिछले तीन दशकों में नेपाल ने भयंकर राजनीतिक अस्थिरता देखी है। यहाँ कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। अवसरवादी गठबंधनों और भ्रष्टाचार ने आम जनता, विशेषकर युवाओं का भरोसा मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था से कम कर दिया है। बेरोजगारी और चरमराती अर्थव्यवस्था के कारण लाखों युवा पलायन कर रहे हैं। आम नागरिकों का एक बड़ा वर्ग अब यह महसूस करने लगा है कि संघीय ढांचा केवल राजनीतिक अभिजात वर्ग की जेबें भरने के काम आया है, जबकि राजशाही के दौर में अनुशासन और व्यवस्था बेहतर थी।

सांस्कृतिक पहचान बनाम आधुनिक राजनीति; असमंजस में नेपाल

हिंदू राष्ट्र समर्थकों का तर्क है कि 2015 में धर्मनिरपेक्षता को बिना जनमत संग्रह के थोपा गया, जिससे नेपाल की सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान को चोट पहुंची। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि राजशाही और हिंदू राष्ट्र के प्रति यह बढ़ता आकर्षण अतीत के प्रति मोह से अधिक वर्तमान व्यवस्था से उपजी निराशा का नतीजा है। नेपाल आज राजशाही बनाम गणराज्य के दोराहे पर नहीं, बल्कि जनता के अटूट विश्वास और नेताओं के प्रति बढ़ते अविश्वास के बीच खड़ा है। 2026 के चुनाव तय करेंगे कि नेपाल अपने क्रांतिकारी पथ पर आगे बढ़ेगा या अपनी पुरानी जड़ों की ओर लौटेगा।

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