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Home»#Trending»झारखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था संकट में : सहायक प्राध्यापक नियुक्ति में देरी से गिर रही गुणवत्ता, सुधार की उठी मांग
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झारखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था संकट में : सहायक प्राध्यापक नियुक्ति में देरी से गिर रही गुणवत्ता, सुधार की उठी मांग

सहायक प्राध्यापक नियुक्ति प्रक्रिया में राष्ट्रीय मॉडल अपनाने की मांग तेज
By Muzaffar HussainOctober 16, 20255 Mins Read
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Ranchi : झारखंड राज्य को बने अब 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन इस लंबे समय के बावजूद राज्य में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वह प्रगति नहीं हो पाई है, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। शिक्षा किसी भी राज्य के विकास की रीढ़ मानी जाती है और यदि उसी में ठहराव आ जाए, तो संपूर्ण विकास प्रक्रिया पर असर पड़ता है। हाल ही में नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय में आयोजित दीक्षांत समारोह में झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने भी इसी मुद्दे पर चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि “उच्च शिक्षा के मामले में झारखंड देश के अन्य राज्यों की तुलना में काफी पीछे है।”

राज्यपाल के इस बयान ने एक बार फिर झारखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। राज्य के कई विश्वविद्यालयों में वर्षों से सहायक प्राध्यापक के पद खाली पड़े हैं। नियुक्ति प्रक्रिया की धीमी रफ्तार और प्रशासनिक लापरवाही के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव होता जा रहा है।

झारखंड में अधूरी नियुक्ति प्रक्रिया और ठहराव

राज्य गठन के बाद अब तक केवल दो बार विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की गई, वह भी अधूरी रह गई। विज्ञापन संख्या 4/2018 और 5/2018 के तहत सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति प्रक्रिया वर्ष 2018 में प्रारंभ की गई थी, लेकिन वर्ष 2025 तक भी कई विषयों की इंटरव्यू प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है। यह देरी न केवल प्रशासनिक अक्षमता को दर्शाती है, बल्कि हजारों योग्य अभ्यर्थियों के भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

सूत्रों के अनुसार, झारखंड में लगभग 5000 सहायक प्राध्यापक के पद अभी भी रिक्त हैं। इन खाली पदों की वजह से विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। नियमित शिक्षकों के अभाव में अतिथि या अनुबंध आधारित शिक्षक पढ़ा रहे हैं, जिससे शिक्षण की स्थिरता और गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ रहा है।

देश के अन्य राज्यों और विश्वविद्यालयों की सफल नीतियाँ

देश के कई राज्य और निजी विश्वविद्यालय सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता और तेजी का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर चुके हैं। इन संस्थानों और आयोगों में जिस तरह से नियुक्ति प्रक्रिया अपनाई गई है, वह झारखंड के लिए एक आदर्श मॉडल साबित हो सकता है।

उदाहरणस्वरूप-

  • अशोका यूनिवर्सिटी, सोनीपत, हरियाणा।
  • धीरूभाई अंबानी इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी, गांधीनगर, गुजरात।
  • मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन, कर्नाटक।
  • अमृता विश्व विद्यापीठम, कोयंबटूर, तमिलनाडु।

वहीं, कई राज्यों के विश्वविद्यालय सेवा आयोग जैसे

  • राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन (RPSC),
  • मध्य प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन (MPPSC),
  • महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन (MPSC),
  • मद्रास यूनिवर्सिटी सर्विस कमीशन,
  • तेलंगाना यूनिवर्सिटी सर्विस कमीशन

इन आयोगों एवं विश्वविद्यालयों की प्रणाली में विषयवार प्रतियोगिता परीक्षा ली जाती है, जिसका परिणाम 24 घंटे के भीतर प्रकाशित कर दिया जाता है और एक सप्ताह के भीतर प्रमाण पत्र सत्यापन एवं साक्षात्कार की प्रक्रिया पूरी कर दी जाती है। यह तेज और पारदर्शी प्रक्रिया अभ्यर्थियों के लिए न केवल सुविधाजनक है, बल्कि संस्थानों के लिए भी लाभकारी सिद्ध होती है।

झारखंड में शिक्षा व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव

झारखंड में नियुक्तियों की देरी का सीधा असर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। विश्वविद्यालयों में विषय विशेषज्ञों की भारी कमी हो गई है, जिससे न तो शोध कार्य सुचारु रूप से चल पा रहे हैं और न ही छात्रों को विषय की गहराई तक शिक्षा मिल पा रही है।

इस स्थिति के कारण झारखंड के छात्रों को मजबूरीवश अन्य राज्यों या निजी विश्वविद्यालयों में दाखिला लेना पड़ता है, जहां फीस कई गुना अधिक होती है। उदाहरण के तौर पर, अशोका यूनिवर्सिटी या मणिपाल यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों में प्रति वर्ष लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे राज्य के छात्रों पर आर्थिक बोझ तो बढ़ ही रहा है, साथ ही झारखंड की प्रतिभा और आर्थिक संसाधन दोनों का पलायन हो रहा है। यह स्थिति राज्य के शैक्षणिक और आर्थिक दोहन का उदाहरण बन चुकी है।

जरूरत ठोस पहल की : राज्य सरकार के लिए सुझाव

राज्य सरकार के सामने अब यह एक बड़ी चुनौती बन चुकी है कि झारखंड में उच्च शिक्षा को किस तरह पुनर्जीवित किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड सरकार को देश के सफल विश्वविद्यालयों और आयोगों की नियुक्ति प्रणाली का अध्ययन कर उसे अपने राज्य में लागू करना चाहिए।

यदि झारखंड सरकार तेज, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक नियुक्ति प्रक्रिया अपनाती है, तो इससे हजारों योग्य अभ्यर्थियों को समय रहते रोजगार का अवसर मिलेगा। साथ ही, विश्वविद्यालयों में स्थायी शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ेगी और छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त होगी।

गुणवत्ता आधारित शिक्षा : भविष्य की दिशा

शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण का आधार है। यदि झारखंड को शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बनना है, तो उसे मात्र विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उनमें पढ़ाने वाले शिक्षकों की गुणवत्ता सुनिश्चित करनी होगी।

नियुक्ति प्रक्रिया को वर्षों तक लटकाना न केवल प्रशासनिक असफलता है, बल्कि यह राज्य के युवाओं के सपनों के साथ अन्याय भी है। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार की यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल आलोचना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि यदि उच्च शिक्षा में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले समय में झारखंड “शैक्षणिक पिछड़ेपन” की श्रेणी में और गहराई तक चला जाएगा। 

झारखंड को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण विकास सुनिश्चित करने के लिए अब निर्णायक कदम उठाने होंगे। राज्य सरकार को निजी विश्वविद्यालयों और अन्य आयोगों की नीतियों से प्रेरणा लेकर उसे झारखंड में लागू करना चाहिए। ऐसा करने से न केवल राज्य के छात्रों को अपने ही राज्य में उच्च स्तरीय शिक्षा मिलेगी, बल्कि हजारों योग्य शिक्षकों को रोजगार का अवसर भी मिलेगा। इससे झारखंड की शिक्षा प्रणाली में नई ऊर्जा का संचार होगा और राज्य देश के अग्रणी शैक्षणिक राज्यों की श्रेणी में शामिल हो सकेगा।

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