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जब एम. फातिमा ने रचा भारतीय विधि का नया इतिहास, बनीं देश की पहली महिला सुप्रीम कोर्ट जज

न्याय के सिंहासन पर आधी आबादी का पहला हस्ताक्षर, न्यायपालिका में तोड़ी थी पुरुष वर्चस्व की दीवार, जानिए भारत की पहली महिला शीर्ष न्यायाधीश को

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रांची: 6 अक्टूबर 1989 की वह तारीख जो भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में हमेशा अमर है। स्वतंत्रता के करीब चार दशक बाद देश के सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में वह क्षण आया, जब किसी महिला न्यायाधीश ने संविधान और न्याय की शपथ लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत के मंच पर अपना कदम रखा। वह नाम है न्यायमूर्ति एम. फातिमा बीवी का।

वे केवल भारत के उच्चतम न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश ही नहीं बनीं, बल्कि पूरे एशिया महाद्वीप में किसी सर्वोच्च संवैधानिक न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनने का गौरव भी उन्होंने ही हासिल किया। उनका यह सफर केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि बंदिशों, रूढ़ियों और पुरुष वर्चस्व वाले विधिक पेशे में करोड़ों भारतीय बेटियों के लिए खुले आसमान का द्वार था।

त्रावणकोर के छोटे से कस्बे से कानून की दुनिया तक

मीरा साहिब फातिमा बीवी का जन्म 30 अप्रैल 1927 को केरल के पथानामथिट्टा में हुआ था। उनके पिता अन्नवीटिल मीरा साहिब एक सरकारी कर्मचारी थे और माता खदीजा बीबी एक गृहिणी थीं। जिस दौर में रूढ़िवादी सामाजिक ढांचे में लड़कियों को उच्च शिक्षा हासिल करने के अवसर बेहद सीमित थे, उस दौर में उनके पिता ने अपनी बेटी की बौद्धिक क्षमता को पहचाना और आगे की पढ़ाई के लिए प्रेरित किया।

फातिमा बीवी ने तिरुवनंतपुरम के यूनिवर्सिटी कॉलेज से रसायन विज्ञान में स्नातक किया। उनकी रुचि विज्ञान के क्षेत्र में थी, लेकिन उनके पिता की इच्छा थी कि वे कानून की पढ़ाई करें। पिता के सुझाव पर उन्होंने गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, तिरुवनंतपुरम में दाखिला लिया। उस समय उनकी कक्षा में गिने-चुने महिला छात्र थीं। 1950 में जब उन्होंने बार काउंसिल की परीक्षा दी, तो उन्होंने शीर्ष स्थान हासिल कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उसी वर्ष उन्होंने एक वकील के रूप में अपना पंजीकरण कराया।

मुंसिफ से सर्वोच्च न्यायालय, सीढ़ी-दर-सीढ़ी तय किया मुकाम

फातिमा बीवी ने कोई राजनीतिक या पारिवारिक रसूख के सहारे शीर्ष स्थान नहीं पाया, बल्कि उन्होंने न्यायिक सेवा की सबसे निचली सीढ़ी से अपने सफर की शुरुआत की।

  • निचली अदालत से शुरुआत (1958): उन्होंने मई 1958 में केरल अधीनस्थ न्यायिक सेवा में मुंसिफ के रूप में कार्यभार संभाला। अपनी कर्तव्यनिष्ठा और अचूक फैसलों के बल पर वे सब-ऑर्डिनेट जज, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) और बाद में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद तक पहुंचीं।
  • हाई कोर्ट में नियुक्ति (1983-1984): 1983 में उन्हें केरल उच्च न्यायालय में अतिरिक्त न्यायाधीश और मार्च 1984 में स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
  • सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक नियुक्ति (1989): केरल उच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त होने के कुछ ही महीने बाद, 6 अक्टूबर 1989 को उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किया गया। इस पद पर वे 29 अप्रैल 1992 तक आसीन रहीं।

विधि और समाज को दिशा देने वाले फैसले

शीर्ष अदालत में अपने लगभग तीन साल के कार्यकाल के दौरान न्यायमूर्ति फातिमा बीवी ने कई महत्वपूर्ण संवैधानिक और दीवानी मामलों में अपनी गहरी विधिक अंतर्दृष्टि का परिचय दिया। वे निष्पक्षता, प्राकृतिक न्याय और मानवीय गरिमा की प्रबल पक्षधर थीं।

उन्होंने कई फैसलों में यह स्पष्ट किया कि राज्य या प्रशासन की शक्तियों का उपयोग कभी मनमाना नहीं हो सकता। सार्वजनिक नीति और सामाजिक न्याय के मामलों में उनका मत था कि कानून समय के साथ समाज की जरूरतों के अनुसार विकसित होना चाहिए, न कि पुरानी धारणाओं में बंधा रहे। महिला अधिकारों, संपत्ति में उत्तराधिकार और पिछड़े वर्गों के कल्याण से जुड़े मामलों में उनके तार्किक और संवेदनशील रुख की विधि विशेषज्ञों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की।

सेवानिवृत्ति के बाद मानवाधिकार और राजभवन का दायित्व

सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका राष्ट्र निर्माण में योगदान थमा नहीं।

1. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC): वे 1993 में स्थापित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की शुरुआती सदस्यों में शामिल रहीं, जहां उन्होंने नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा में अहम भूमिका निभाई। इसके साथ ही वे केरल पिछड़ा वर्ग आयोग की अध्यक्ष भी बनीं।
2. तमिलनाडु की राज्यपाल (1997-2001): जनवरी 1997 में उन्हें तमिलनाडु का राज्यपाल नियुक्त किया गया। अपने राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान वे अपने संवैधानिक कर्तव्यों और निष्पक्षता पर अडिग रहीं। उस दौर के जटिल राजनीतिक घटनाक्रमों में उन्होंने सदैव कानूनी मर्यादाओं को सर्वोपरि रखा।

जीवन का सार और प्रेरणादायी विरासत

न्यायमूर्ति फातिमा बीवी का कहना था—“यदि मैं यह कर सकती हूं, तो कोई भी भारतीय महिला यह मुकाम हासिल कर सकती है।” उन्होंने अक्सर अदालतों और बार में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर चिंता जताई और हमेशा इस बात पर बल दिया कि जब तक न्यायपालिका में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी नहीं होगी, तब तक न्याय का स्वरूप अधूरा रहेगा।

23 नवंबर 2023 को 96 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हो गया। लेकिन उन्होंने जिस कांच की छत (Glass Ceiling) को 1989 में तोड़ा था, उसी की बदौलत आज भारत के उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में दर्जनों महिला न्यायाधीश अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। उनका जीवन यह साबित करता है कि अटूट लगन, सत्यनिष्ठा और समर्पण के दम पर किसी भी दुर्गम शिखर को फतह किया जा सकता है।

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