World News: अमेरिका द्वारा ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई की चर्चाओं ने जहां पश्चिम एशिया में हलचल बढ़ा दी है, वहीं इसका सबसे गहरा असर पाकिस्तान की चिंता में साफ दिखाई दे रहा है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कथित अटैक प्लान को लेकर पाकिस्तान को डर है कि अगर ईरान में सत्ता परिवर्तन या बड़े पैमाने पर अस्थिरता हुई, तो उसका सीधा असर देश के अशांत बलूचिस्तान प्रांत पर पड़ेगा।

पाकिस्तान और ईरान के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो सीधे बलूचिस्तान से लगती है। यह वही इलाका है, जहां दशकों से अलगाववादी आंदोलन चल रहा है। सीमा के दूसरी ओर ईरान का सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत है, जहां रहने वाले बलूच समुदाय के पाकिस्तान के बलूचों से गहरे जातीय और जनजातीय रिश्ते हैं। ऐसे में ईरान में किसी भी तरह की उथल-पुथल का असर सीमा पार तेजी से फैल सकता है।

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पाकिस्तान के पूर्व राजदूत आसिफ दुर्रानी का कहना है कि ईरान में चाहे आंतरिक सत्ता संघर्ष हो या बाहरी सैन्य हस्तक्षेप, उसका सीधा प्रभाव पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा पर पड़ेगा। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान कमजोर होता है, तो बलूच विद्रोही गुटों को नए ठिकाने, हथियार और समर्थन मिल सकता है, जिससे सीमा पार आतंकवाद और हिंसा बढ़ने का खतरा है।

बलूचिस्तान पहले से ही पाकिस्तान के लिए सबसे संवेदनशील प्रांतों में से एक है। यहां सक्रिय अलगाववादी संगठन न सिर्फ पाकिस्तानी सुरक्षाबलों, बल्कि चीनी हितों को भी निशाना बनाते रहे हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) इसी प्रांत से होकर गुजरता है और इसमें किसी भी तरह की अस्थिरता पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दे सकती है।

इसके अलावा पाकिस्तान को एक और बड़े शरणार्थी संकट का डर भी सता रहा है। अफगानिस्तान से पहले ही लाखों शरणार्थी पाकिस्तान में मौजूद हैं। अगर ईरान में युद्ध या सत्ता परिवर्तन हुआ, तो बड़ी संख्या में ईरानी शरणार्थियों के आने की आशंका है, जिसे आईएमएफ के सहारे चल रही अर्थव्यवस्था संभाल नहीं पाएगी।

पूर्व विदेश सचिव जोहर सलीम ने चेतावनी दी है कि ईरान में किसी भी तरह का बाहरी हस्तक्षेप पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है। पाकिस्तानी मीडिया भी मान रहा है कि ईरान में सत्ता का पतन पाकिस्तान के लिए सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व से जुड़ा संकट बन सकता है।

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