Washington, USA: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संभावित दूसरे कार्यकाल की शुरुआती रणनीतिक बैठकों से जुड़ा एक बड़ा दावा सामने आया है। हाल ही में प्रकाशित किताब ‘रिजीम चेंज’ के अनुसार, ट्रंप प्रशासन के भीतर यूक्रेन-रूस युद्ध को समाप्त करने की रणनीति पर चर्चा के दौरान यूक्रेन में भारतीय सैनिकों को पीसकीपिंग फोर्स के रूप में तैनात करने का प्रस्ताव रखा गया था। हालांकि, ट्रंप ने इसे तुरंत खारिज करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके लिए तैयार नहीं होंगे।
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किताब के मुताबिक, 30 जनवरी 2025 को व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में हुई उच्चस्तरीय बैठक में यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए ‘अमेरिका फर्स्ट’ शांति योजना पर चर्चा हुई। इस दौरान उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सुझाव दिया कि नाटो देशों के बजाय भारत या सऊदी अरब के सैनिकों को शांति मिशन में शामिल किया जा सकता है, ताकि रूस इसे सीधी सैन्य चुनौती न माने।
ट्रंप ने क्यों ठुकराया प्रस्ताव?
किताब में दावा किया गया है कि ट्रंप ने इस सुझाव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत ऐसा कभी नहीं करेगा और न ही इस तरह के अभियान का आर्थिक बोझ उठाएगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों का भी जिक्र करते हुए कहा कि अच्छे संबंध होने के बावजूद भारत इस मिशन में शामिल होने के लिए तैयार नहीं होगा।
बैठक में सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल कीथ केलॉग ने ‘एन अमेरिका फर्स्ट प्लान: ट्रंप्स हिस्टोरिक पीस डील फॉर रूस-यूक्रेन वॉर’ शीर्षक से एक प्रारूप भी पेश किया था। इसमें युद्धविराम, कब्जे वाले क्षेत्रों की स्थिति और शांति बनाए रखने के लिए विदेशी सैनिकों की तैनाती जैसे प्रस्ताव शामिल थे।
भारत की विदेश नीति पर भी चर्चा
शुरुआती मसौदे में फ्रांस, ब्रिटेन और नीदरलैंड जैसे यूरोपीय देशों के सैनिकों का जिक्र था, लेकिन जेडी वेंस ने इसे जोखिम भरा बताते हुए भारत और सऊदी अरब के नाम सुझाए। हालांकि ट्रंप ने इस विकल्प को स्वीकार नहीं किया। किताब में यह भी कहा गया है कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और स्वतंत्र विदेश नीति को देखते हुए उसके इस तरह के सैन्य मिशन में शामिल होने की संभावना बेहद कम थी। भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान तटस्थ रुख बनाए रखा है। उसने पश्चिमी प्रतिबंधों का हिस्सा बनने से इनकार किया और रूस के साथ अपने ऊर्जा एवं रणनीतिक संबंध भी जारी रखे।
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विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत यूक्रेन में सैनिक भेजने के किसी प्रस्ताव को स्वीकार करता, तो इससे रूस के साथ उसके लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक संबंध प्रभावित हो सकते थे। यही वजह है कि भारत लगातार शांति और संवाद का समर्थन करता रहा है, लेकिन किसी भी सैन्य गुट का हिस्सा बनने से बचता आया है। किताब के दावों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकता ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत अमेरिकी सैनिकों और करदाताओं पर अतिरिक्त बोझ से बचना था। ऐसे में दूसरे देशों की भूमिका पर चर्चा हुई, लेकिन भारत को लेकर ट्रंप का आकलन था कि नई दिल्ली इस तरह के मिशन में शामिल होने के लिए तैयार नहीं होगी।




