फॉण्ट कनवर्टर NEW

पाताल में जाता जल स्तर और कंक्रीट का जाल: गायब होते तालाबों ने खड़ा किया भीषण जल संकट

रांची: कभी ‘तालाबों की नगरी’ और सुहावने मौसम के लिए मशहूर रही झारखंड की राजधानी रांची आज एक भयावह दौर से गुजर रही है. शहर का भूजल स्तर लगातार नीचे गिर रहा है, कुएं-नलकूप सूख रहे हैं और जल संकट हर बीतते दिन के साथ

अपनी भाषा में पढ़ें

रांची: कभी ‘तालाबों की नगरी’ और सुहावने मौसम के लिए मशहूर रही झारखंड की राजधानी रांची आज एक भयावह दौर से गुजर रही है. शहर का भूजल स्तर लगातार नीचे गिर रहा है, कुएं-नलकूप सूख रहे हैं और जल संकट हर बीतते दिन के साथ और अधिक गहराता जा रहा है. इस संकट का सबसे बड़ा और कड़वा सच यह है कि शहर के पारंपरिक जल स्रोत यानी यहाँ के सैकड़ों ऐतिहासिक तालाब अब कंक्रीट के मलबे के नीचे दफन हो चुके हैं. भू-माफियाओं के अवैध अतिक्रमण और प्रशासन की घोर उदासीनता के कारण शहर की प्राकृतिक जल संचयन प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो गई है, जिससे वर्षा का पानी जमीन के भीतर जाने के बजाय बर्बाद हो रहा है.

1975 की टोपोशीट खोल रही है प्रशासनिक दावों की पोल

हैरानी की बात यह है कि जब भी शहर के गुम हो चुके तालाबों को खोजने या उन्हें पुनर्जीवित करने की मांग उठती है, तो प्रशासनिक अधिकारी ‘नक्शा उपलब्ध नहीं होने’ का तकनीकी बहाना बनाकर हाथ खड़े कर लेते हैं. लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. साल 1975 के रांची शहर के आधिकारिक टोपोशीट (मानचित्र) में इन सभी तालाबों के लोकेशन और उनके अस्तित्व के स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं.

सैटेलाइट तस्वीरों और पुराने सरकारी दस्तावेजों से यह साफ है कि आधी सदी पहले तक शहर के पास पानी का एक बड़ा प्राकृतिक नेटवर्क था. यदि आज भी प्रशासन थोड़ी सी प्रशासनिक इच्छाशक्ति दिखाए, तो 1975 की टोपोशीट को आधार मानकर इन जल स्रोतों की पहचान की जा सकती है और अतिक्रमणकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई कर इन्हें दोबारा जीवित किया जा सकता है. लेकिन हर साल गर्मी बीतने के बाद मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है.

2000 तालाबों का शहर अब कंक्रीट का जंगल, बचे हैं सिर्फ 38 जलाशय

इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों के जमाने में रांची और उसके आसपास के इलाकों में लगभग दो हजार तालाब हुआ करते थे. ये तालाब न केवल शहर की प्यास बुझाते थे, बल्कि आसपास के बड़े क्षेत्र के वाटर लेबल (भूजल स्तर) को भी बनाए रखते थे. लेकिन कंक्रीट के बढ़ते जंगलों ने इन जलाशयों को लील लिया. तालाबों को पाटकर उन पर बड़ी-बड़ी इमारतें, व्यावसायिक परिसर और अवैध बस्तियां खड़ी कर दी गईं.

रांची नगर निगम के अपने ही आंकड़े बताते हैं कि अब शहर में महज 38 तालाब ही जीवित बचे हैं. इन बचे हुए तालाबों की स्थिति भी बेहद दयनीय है. इनमें से कई कैसर-ए-हिंद, नगर निगम, मिशन ट्रस्ट, सेक्रेटरी ऑफ कॉर्डमिल, महाराजा उदयनाथ शाहदेव, मत्स्य विभाग और सेना के नियंत्रण में हैं, जबकि कुछ निजी व्यक्तियों के नाम पर दर्ज हैं. उदाहरण के लिए, करबला टैंक तालाब पर पूरी तरह से अतिक्रमण हो चुका है और उसका नामोनिशान मिट गया है. यही हाल चुटिया क्षेत्र में भी है. यहां से भी कई तालाब गायब होकर फ्लैट का रूप ले चुके हैं. इसी तरह वार्ड आठ में स्थित बोडलो तालाब पर भी मकान बन चुके हैं और बड़ा तालाब के किनारे पसरा कचरा इसके अस्तित्व को समाप्त कर रहा है. जब जल स्रोत ही मिट जाएंगे, तो पानी पाताल में नहीं जाएगा तो कहाँ जाएगा?

ग्रामीण इलाकों में ‘जल और जीवन’ को बचाने की अनोखी मुहिम

एक तरफ जहां शहरी इलाकों में पुराने तालाबों का दम घुट रहा है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल स्तर को सुधारने और जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए झारखंड सरकार का मत्स्य विभाग एक सराहनीय योजना चला रहा है. विभाग ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को संतुलित करने के लिए “जमीन दीजिए, तालाब लीजिए” की नीति अपनाई है.

इस योजना के तहत राज्य के विभिन्न जिलों में नए तालाब बनाने का लक्ष्य रखा गया है. इसके माध्यम से न सिर्फ जमीन के गिरते जल स्तर को रोकने का प्रयास हो रहा है, बल्कि ग्रामीणों को मछली पालन के जरिए आत्मनिर्भर भी बनाया जा रहा है.

तालाब निर्माण पर भारी सरकारी अनुदान

ग्रामीणों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार तालाब निर्माण के लिए तीन लाख रुपये की भारी-भरकम राशि स्वीकृत कर रही है:

  • SC और ST वर्ग: इन श्रेणियों के आवेदकों को कुल लागत का केवल 20 प्रतिशत हिस्सा अपनी जेब से लगाना होता है, जबकि 80 प्रतिशत राशि सरकार वहन करती है.

  • OBC और सामान्य वर्ग: इन्हें 10 प्रतिशत राशि लगानी होती है और 90 प्रतिशत सरकारी अनुदान (सब्सिडी) मिलता है.

रेन वाटर हार्वेस्टिंग: अब पानी बचाना सिर्फ पसंद नहीं, कानूनी मजबूरी

सरकार ने भूजल स्तर को पाताल में जाने से रोकने के लिए कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है. रांची नगर निगम क्षेत्र में भवन निर्माण के नियमों को सख्त करते हुए स्पष्ट किया गया है कि 300 वर्ग मीटर से बड़े सभी भूखंडों और नए बनने वाले भवनों पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संचयन) सिस्टम लगाना अनिवार्य है. यदि कोई भवन मालिक इस नियम की अनदेखी करता है या वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर नहीं बनाता है, तो उस पर भारी आर्थिक दंड लगाने के साथ-साथ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now
Facebook
X
Threads
WhatsApp
Telegram