Jamshedpur: पूर्वी सिंहभूम जिले के धालभूमगढ़ थाना क्षेत्र के बाबोयदा गांव में डायन होने के संदेह में दो सगी बहनों की हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। आदिवासी सेंगेल अभियान ने इस घटना को लेकर अंधविश्वास और डायन प्रथा के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। संगठन ने हत्याकांड में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संलिप्त लोगों के साथ चोडोयगुडा गांव के एक कथित ओझा की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
इस संबंध में बुधवार को सेंगेल दिशोम परगना सोनाराम सोरेन, सेंगेल माझी परगना मांडवा के केंद्रीय अध्यक्ष कविराज मुर्मू और पोनोत परगना जूनियर मुर्मू के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त से मुलाकात की और मांगों से संबंधित ज्ञापन सौंपा।
संगठन ने ज्ञापन में कहा कि बाबोयदा गांव में झाड़-फूंक और डायन होने के संदेह में लक्ष्मी मारडी और दुलारी सोरेन की कुल्हाड़ी से हत्या कर दी गई थी। संगठन का आरोप है कि इस घटना में चोडोयगुडा गांव के एक कथित ओझा की अप्रत्यक्ष भूमिका हो सकती है। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर उसकी संलिप्तता सामने आने पर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
आदिवासी सेंगेल अभियान ने कहा कि ग्रामीण और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में अंधविश्वास के कारण निर्दोष लोगों को प्रताड़ना, सामाजिक बहिष्कार और हिंसा का सामना करना पड़ता है। संगठन के अनुसार, डायन प्रथा के पीछे अंधविश्वास के अलावा आपसी रंजिश, ईर्ष्या-द्वेष, स्वार्थ और जमीन-जायदाद हड़पने की मंशा भी हो सकती है। ऐसी घटनाओं पर समाज की चुप्पी को संगठन ने गंभीर चिंता का विषय बताया।
डायन प्रथा पर रोक लगाने के लिए संगठन ने प्रशासन से कठोर कदम उठाने की मांग की है। इसके तहत जिस गांव में डायन के नाम पर हिंसा या हत्या की घटना हो, वहां सामूहिक जुर्माना लगाने का सुझाव दिया गया है। हालांकि, डायन प्रथा का विरोध करने संबंधी शपथ-पत्र देने वाले नागरिकों को इससे छूट देने की बात भी कही गई है। संगठन ने पारंपरिक माझी-परगना व्यवस्था के प्रमुखों की जिम्मेदारी तय करने और प्रत्येक थाना क्षेत्र में पुलिस-प्रशासन की निगरानी में पंचायत प्रतिनिधियों, मीडिया कर्मियों, महिला स्वयं सहायता समूहों तथा प्रबुद्ध नागरिकों की बैठक आयोजित करने की मांग की।
सेंगेल दिशोम परगना सोनाराम सोरेन ने कहा कि आदिवासी समाज को नशापान, अंधविश्वास और कुप्रथाओं से मुक्त करने के लिए सामाजिक व्यवस्था में बदलाव जरूरी है। उन्होंने पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था में शिक्षित और लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधियों को प्राथमिकता देने तथा डायन प्रथा के खिलाफ व्यापक जनजागरण अभियान चलाने पर जोर दिया। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की मांग करते हुए कहा कि गांवों में बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिलने से लोग बीमारी के इलाज के लिए ओझा-सोखा पर निर्भर नहीं रहेंगे। प्रतिनिधिमंडल में बिमो मुर्मू, कुनूराम बास्के, रामेश्वर मुर्मू समेत अन्य सदस्य शामिल थे।





