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रांची: झारखंड में कृषि और किसानों के विकास को लेकर सरकारें भले ही बड़े-बड़े दावे और लोकलुभावन घोषणाएं करती रही हों, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। सच तो यह है कि राज्य के अन्नदाता आज भी बुनियादी सरकारी सुविधाओं से पूरी तरह वंचित हैं। हर साल किसानों को जागरूक करने के नाम पर सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा सेमिनारों, गोष्ठियों और प्रशिक्षण शिविरों के आयोजन में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जाते हैं। मंचों से किसानों के हितों की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन इन आयोजनों का वास्तविक लाभ किसानों के खेतों तक कितना पहुंच पाता है, यह एक बड़ा और विचारणीय प्रश्न बना हुआ है।
राज्य की बदहाल कृषि व्यवस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 24 जिलों वाले इस राज्य में महज 8 मृदा (मिट्टी) प्रयोगशालाएं ही संचालित हैं। इन चुनिंदा प्रयोगशालाओं में रांची, गुमला, चक्रधरपुर और गिरिडीह समेत कुछ अन्य जिलों के नाम शामिल हैं। हैरानी की बात यह है कि अकेले राजधानी रांची में तीन प्रयोगशालाएं हैं, लेकिन उनकी स्थिति भी बेहद दयनीय और वेंटिलेटर पर पड़ी सांसों जैसी है। ऐसे में दम तोड़ रहीं मृदा प्रयोगशालाओं के कारण धरतीपुत्रों का भविष्य अधर में लटका है और भगवान भरोसे है।
अधिकारियों और कृषि वैज्ञानिकों का भारी टोटा
झारखंड राज्य गठन के बाद से लेकर आज तक इन मृदा प्रयोगशालाओं में एक भी स्थायी तकनीकी नियुक्ति नहीं की जा सकी है। वर्तमान में ये प्रयोगशालाएं पूरी तरह भगवान भरोसे पीपीपी (PPP) मोड पर किसी तरह घिसट रही हैं। लैब के भीतर रखे उपकरण और सामान जर्जर होकर बेकार हो चुके हैं। आधुनिक खेती के इस दौर में इन प्रयोगशालाओं के पास अत्याधुनिक मशीनें तक उपलब्ध नहीं हैं। मृदा संरक्षण, मिट्टी जांच और जरूरी परामर्श के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बंदरबांट तो हो रहा है, लेकिन खेतों में पसीना बहाने वाले किसानों को उनकी भूमि की गुणवत्ता बताने वाला कोई नहीं है। इस प्रशासनिक उदासीनता का सीधा और प्रतिकूल असर राज्य के कृषि उत्पादन और किसानों की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है।
क्या है मृदा प्रयोगशाला और क्यों है जरूरी?
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य के कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी के लिए सरकार ने मृदा प्रयोगशाला की व्यवस्था की थी। इसके तहत किसानों को अपनी फसलों के बीज बोने से पहले अपनी कृषि भूमि की मिट्टी की जांच करानी होती है। इस जांच से भूमि की गुणवत्ता, उसमें मौजूद कमियों और पोषक तत्वों का पता चलता है। जांच रिपोर्ट के आधार पर कृषि वैज्ञानिक किसानों को भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए आवश्यक पोषक तत्व और खाद डालने की सलाह देते हैं, ताकि फसल को नष्ट होने से बचाया जा सके और उत्पादन में रिकॉर्ड इजाफा हो।
झारखंड के संदर्भ में यह जांच इसलिए भी सबसे ज्यादा जरूरी है क्योंकि यहां की अधिकांश भूमि अम्लीय (Acidic) है। तकनीकी रूप से यह भूमि चाय उत्पादन के लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती है, लेकिन राज्य में व्यावसायिक स्तर पर चाय की खेती नहीं की जाती। ऐसे में सामान्य फसलों के लिए मिट्टी की अम्लता को शून्य या संतुलित करने के लिए उसमें निश्चित मात्रा में चूना मिलाना पड़ता है। लेकिन किस खेत में कितना चूना मिलाना है या किस पोषक तत्व की कमी है, यह बिना वैज्ञानिक मृदा जांच के पता लगाना नामुमकिन है।
समय पर नहीं पहुंचते बीटीएम, फेल हो रही कड़ियां
सरकार और किसानों के बीच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी ब्लॉक टेक्निकल मैनेजर (BTM) होते हैं। इनका मुख्य कार्य किसानों के आग्रह पर उनके खेतों में जाकर जीपीएस (GPS) सिस्टम और विशेष वैज्ञानिक विधि से मिट्टी का सैंपल लेना है। इस प्रक्रिया में भूमि को शंकुधनुमा (Cone-shaped) काटकर मिट्टी उठाई जाती है और उसके चार हिस्से कर विपरीत हिस्सों को सैंपल के रूप में लैब भेजा जाता है। इस विधि में जरा सी भी चूक होने पर रिपोर्ट गलत आ सकती है। इसके बाद लैब से 12 से 15 दिनों में आने वाली 12 पैरामीटर की रिपोर्ट के आधार पर किसानों को कृषि वैज्ञानिकों से परामर्श दिलाना बीटीएम की जिम्मेदारी है। लेकिन हकीकत यह है कि बीटीएम कभी समय पर किसानों तक पहुंचते ही नहीं हैं। नतीजा यह है कि आज भी झारखंड का किसान पारंपरिक और बिना जांच वाली खेती के सहारे घाटा उठाने को मजबूर है।

