रांची। JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा-2023 का विवाद अब और बढ़ गया है। परीक्षा और नियुक्तियों को रद्द करने के सरकार के फैसले पर हाई कोर्ट की रोक के बाद चयन प्रक्रिया से बाहर हुए कुछ अभ्यर्थियों ने भी अदालत में अपना पक्ष रखने की मांग की है।
हजारीबाग के राजेश प्रसाद समेत अन्य अभ्यर्थियों ने अधिवक्ता कुमार हर्ष के माध्यम से हाई कोर्ट में हस्तक्षेप याचिका दाखिल की है। अभ्यर्थियों का कहना है कि परीक्षा से जुड़े विवाद का सीधा असर उनके भविष्य पर पड़ रहा है, इसलिए उन्हें भी सुनवाई में शामिल किया जाना चाहिए।
परीक्षा का काम जिस एजेंसी को मिला, उस पर सवाल
याचिका में कहा गया है कि JPSC ने परीक्षा के डेटा प्रोसेसिंग और डिजिटल मूल्यांकन का काम TSR Data Processing Private Limited (TDPL) को सौंपा था। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इस एजेंसी को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ पहले ब्लैकलिस्ट कर चुकी है।
अभ्यर्थियों ने सवाल उठाया है कि ऐसी एजेंसी को महत्वपूर्ण सरकारी परीक्षा की जिम्मेदारी कैसे दी गई। उनका कहना है कि इससे परीक्षा की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं।
रिजल्ट पर JPSC सदस्य की आपत्ति का दावा
याचिका में JPSC सदस्य अणिमा हांसदा के कथित बयान का भी जिक्र किया गया है। अभ्यर्थियों के अनुसार, उन्होंने 11वीं से 13वीं सिविल सेवा मुख्य परीक्षा के परिणाम पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया था।
याचिका में दावा किया गया है कि परिणाम तैयार करने में कुछ तकनीकी और प्रक्रियात्मक कमियां थीं। डिजिटल तरीके से उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
परीक्षा नियंत्रकों के तबादले का भी जिक्र
अभ्यर्थियों ने परीक्षा के अंतिम चरण में अधिकारियों के बदलाव को भी सवालों के घेरे में रखा है। याचिका के मुताबिक, परिणाम तैयार होने से पहले परीक्षा नियंत्रक असीम किस्टोप्पा का तबादला हुआ। उनके बाद पद संभालने वाले लोकेश मिश्रा के छुट्टी पर जाने के बाद उप-परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता से परिणाम पर हस्ताक्षर कराए गए।
याचिका में यह भी कहा गया है कि श्वेता गुप्ता को बाद में CID जांच के दौरान गिरफ्तार किया गया था।
मेधावी अभ्यर्थियों को सुनवाई में शामिल करने की मांग
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि परीक्षा प्रक्रिया में हुई कथित अनियमितताओं का नुकसान कई योग्य उम्मीदवारों को हुआ है। ऐसे में मामले की सुनवाई के दौरान उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।
अभ्यर्थियों ने हाई कोर्ट से हस्तक्षेप याचिका स्वीकार करने और मामले में उनकी बात सुनने की मांग की है।




