Deoghar: झारखंड के देवघर जिले के सारठ प्रखंड स्थित कुकराहा गांव का मां दुर्गा मंदिर करीब 160 वर्षों से चली आ रही पूजा परंपरा, प्राचीन लोककथाओं और भव्य स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है। वर्ष 1865 में ठाकुर परिवार के वंशराज सिंह ने यहां मंदिर बनवाया था। आज यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि कुकराहा और आसपास के गांवों की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
नवरात्र के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी को दूर-दराज के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में भक्त मां दुर्गा के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। मंदिर से जुड़ी लोककथाएं, पारंपरिक अनुष्ठान और स्थापत्य की खासियत इसे क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल करती हैं।
ठाकुर परिवार ने की थी दुर्गापूजा की शुरुआत
कुकराहा स्थित मां दुर्गा मंदिर का इतिहास ठाकुर परिवार से जुड़ा है। परिवार की सातवीं पीढ़ी के सदस्य विक्रम सिंह के अनुसार, यहां दुर्गापूजा की शुरुआत उनके पूर्वजों ने की थी। जिस स्थान पर आज भव्य मंदिर स्थापित है, वहां पहले गायों का गोहाल हुआ करता था।
बताया जाता है कि वर्ष 1865 में राजपरिवार के वंशराज सिंह ने इसी स्थान पर मां दुर्गा का मंदिर बनवाया था। इसके बाद से यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना की परंपरा जारी है। समय के साथ मंदिर का स्वरूप बदला और पूजा आयोजन में ग्रामीणों की भागीदारी भी बढ़ती गई।
आज दुर्गापूजा पूरे गांव की सामूहिक आस्था का प्रतीक बन चुकी है। परिवार के सदस्यों के साथ स्थानीय ग्रामीण भी पूजा की तैयारियों और आयोजन की व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अजय नदी से जुड़ी है मां के प्राकट्य की लोककथा
कुकराहा मंदिर से एक लोककथा भी जुड़ी हुई है। स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित कथा के अनुसार, ठाकुर परिवार के पूर्वज लखन सिंह एक दिन खेत में काम कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें अजय नदी की दिशा से किसी बच्ची के रोने की आवाज सुनाई दी।
आवाज सुनकर वह नदी की ओर गए। वहां उन्हें पानी में लकड़ी का एक तख्ता बहता दिखाई दिया। लोकमान्यता के अनुसार, इसी दौरान बच्ची की आवाज में मां दुर्गा ने लखन सिंह को अपने उद्धार और पूजा-अर्चना का संदेश दिया।
कथा के मुताबिक, लखन सिंह लकड़ी के तख्ते को गांव ले आए और अपने घर के गोहाल में रखा। उन्होंने ग्रामीणों को पूरी घटना बताई, जिसके बाद मां दुर्गा की पिंडी स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू की गई। स्थानीय मान्यता है कि इसी घटना से कुकराहा में मां दुर्गा की आराधना की परंपरा शुरू हुई।
मंदिर से जुड़ी एक अन्य मान्यता के अनुसार, नवरात्र के दौरान कभी-कभी परिसर में घुंघरुओं की आवाज सुनाई देती है। श्रद्धालु इसे मां की उपस्थिति और दिव्य शक्ति से जोड़कर देखते हैं। ये मान्यताएं पीढ़ियों से स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित हैं।
भव्य शिखर और आकर्षक द्वार हैं मंदिर की पहचान
कुकराहा का मां दुर्गा मंदिर धार्मिक महत्ता के साथ अपनी स्थापत्य शैली के लिए भी जाना जाता है। मंदिर के शिखर पर स्थापित स्वर्ण और अष्टधातु से निर्मित कलश इसकी भव्यता बढ़ाता है। मंदिर का शिखर दूर से ही दिखाई देता है और श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करता है।
मंदिर का पश्चिमी द्वार भी इसकी खास विशेषताओं में शामिल है। इसे मां विंध्यवासिनी मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है। मंदिर की संरचना में पारंपरिक धार्मिक वास्तुकला और निर्माण की विभिन्न शैलियों का मेल दिखाई देता है।
वर्ष 2016 में महाराष्ट्र के शिल्पकारों ने ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार किया था। इससे मंदिर के स्वरूप को नया रूप मिला। जीर्णोद्धार में ग्रामीणों की भागीदारी ने मंदिर के प्रति उनके जुड़ाव और साझा विरासत को सुरक्षित रखने के प्रयासों को भी दर्शाया।
नवरात्र में नौ दिनों तक रहता है भक्तिमय माहौल
नवरात्र कुकराहा मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर है। प्रतिपदा को कलश स्थापना के साथ पूजा-अर्चना शुरू होती है और पूरे नौ दिनों तक धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।
भक्त मां दुर्गा के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना करते हैं। कई श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने की उम्मीद लेकर मंदिर पहुंचते हैं, जबकि कुछ अपनी मन्नत पूरी होने पर पूजा-अर्चना करते हैं।
नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर में धार्मिक उत्साह के साथ सामुदायिक सहभागिता का माहौल भी रहता है। ग्रामीण पूजा की तैयारियों से लेकर श्रद्धालुओं की सुविधा तक अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाते हैं। इससे यह आयोजन धार्मिक परंपरा के साथ गांव के सामाजिक जीवन का भी अहम हिस्सा बना हुआ है।
षष्ठी से दशमी तक चलती है बलि की परंपरा
मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, कुकराहा में बलि देने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। यह अनुष्ठान षष्ठी से दशमी तक चलता है। महानवमी के दिन विशेष रूप से बड़ी संख्या में श्रद्धालु बलि अर्पित करने पहुंचते हैं।
इस दौरान मंदिर से जुड़े परिवार के सदस्य, समिति और ग्रामीण मिलकर व्यवस्था संभालते हैं। श्रद्धालुओं की आवाजाही और अनुष्ठान को व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने पर ध्यान दिया जाता है। स्थानीय लोग इस परंपरा को मंदिर की प्राचीन पूजा-पद्धति और धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा मानते हैं।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए समिति की तैयारी
नवरात्र में संभावित भीड़ को देखते हुए ठाकुर परिवार और मंदिर संचालन समिति की ओर से व्यवस्थाएं की जाती हैं। समिति के वरिष्ठ सदस्य बहस सिंह के अनुसार, श्रद्धालुओं को सुगम और व्यवस्थित दर्शन कराना समिति तथा ग्रामीणों की जिम्मेदारी है।
सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी को अधिक भीड़ होने की संभावना को देखते हुए जरूरत के अनुसार कतारबद्ध दर्शन की व्यवस्था की गई है। महानवमी के दिन बलि की प्रक्रिया भी परंपरा के अनुसार क्रमबद्ध तरीके से संपन्न कराई जाती है।
समिति ने आयोजन के दौरान शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस-प्रशासन से सहयोग की अपील की है। ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी से मंदिर में दुर्गापूजा की सदियों पुरानी परंपरा आगे बढ़ रही है।
आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है कुकराहा मंदिर
करीब 160 वर्षों से चली आ रही पूजा परंपरा, अजय नदी से जुड़ी लोककथा, विशिष्ट स्थापत्य और नवरात्र के अनुष्ठान कुकराहा के मां दुर्गा मंदिर को खास पहचान देते हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती यह परंपरा स्थानीय लोगों की आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।




