रांची: झारखंड की लोकसंस्कृति और आदिवासी परंपरा से जुड़े पारंपरिक वाद्य मांदर को अब आधिकारिक पहचान मिल गई है। भारत सरकार की भौगोलिक संकेतक (GI) रजिस्ट्री, चेन्नई ने ‘मांदर ऑफ झारखंड’ को GI टैग प्रदान किया है। इससे मांदर के साथ इसे बनाने वाले पारंपरिक कारीगरों को भी नई पहचान मिलेगी।
GI रजिस्ट्री में मांदर का आवेदन संख्या 777 है। इसके लिए आवेदन 24 सितंबर 2021 को किया गया था और इसके भौगोलिक क्षेत्र के रूप में झारखंड को दर्ज किया गया है। मांदर को हस्तशिल्प की श्रेणी में रखा गया है।
पारंपरिक कारीगरी बनी पहचान का आधार
GI के लिए दिए गए आवेदन में मांदर की खास बनावट, स्थानीय कच्चे माल, पारंपरिक तरीके से निर्माण और इसकी विशेष ध्वनि को प्रमुख आधार बनाया गया। झारखंड के आदिवासी समुदायों के संगीत, नृत्य और सामाजिक जीवन में मांदर के लंबे समय से उपयोग का भी उल्लेख किया गया है।
आवेदन में मांदर से जुड़े कई पुराने दस्तावेज भी शामिल किए गए। इनमें 1915 की सरत चंद्र राय की कृति, 1931 की तारकचंद्र दास की कृति और डब्ल्यू. जी. आर्चर की 1940 में प्रकाशित पुस्तक ‘द ब्लू ग्रोव’ में मांदर से जुड़े उल्लेख शामिल हैं।
गुमला के कारीगरों को भी मिली पहचान
GI आवेदन में रैदिह मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, ग्राम जरजट्टा, प्रखंड रैदिह, जिला गुमला को आवेदक बनाया गया है। आवेदन के साथ मांदर बनाने वाले कारीगरों की सूची भी शामिल की गई है।
मांदर को GI टैग मिलने से झारखंड की पारंपरिक कारीगरी और सांस्कृतिक विरासत को देश स्तर पर पहचान मिलने की उम्मीद है। इससे मांदर बनाने वाले कारीगरों को अपने उत्पाद की अलग पहचान बनाने और बाजार तक पहुंच बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
GI की प्रक्रिया में रही महत्वपूर्ण भूमिका
मांदर को GI दर्जा दिलाने की प्रक्रिया में बौद्धिक संपदा और भौगोलिक संकेतक विशेषज्ञ तथा NUSRL रांची के विजिटिंग फैकल्टी डॉ. सत्यदीप सिंह की भूमिका रही। उन्होंने आवेदन से लेकर GI रजिस्ट्री के सामने दस्तावेज और अन्य प्रक्रियाएं पूरी कराने में सहयोग किया। जनवरी 2025 में दिल्ली में हुई अंतिम सुनवाई में भी उन्होंने मामले की पैरवी की।
मांदर से पहले झारखंड की सोहराय-खोवर चित्रकला को GI पहचान मिल चुकी है। अब मांदर को GI टैग मिलने से झारखंड की लोककला और पारंपरिक उत्पादों को पहचान दिलाने की दिशा में एक और उपलब्धि जुड़ गई है।




