Ranchi: झारखंड उच्च न्यायालय ने चतरा जिले के लावालौंग थाना क्षेत्र में एक 19 वर्षीय मैट्रिक छात्र को 10 दिनों तक कथित रूप से अवैध हिरासत में रखने के मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया है। सोमवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान चतरा के पुलिस अधीक्षक (SP) सुमित अग्रवाल व्यक्तिगत रूप से न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति एके राय की खंडपीठ के समक्ष पेश हुए।

अदालत के तीखे सवाल और नाराजगी

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने एसपी से पूछा कि छात्र को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश क्यों नहीं किया गया? अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “पुलिस का दायित्व जनता को सुरक्षा देना है, न कि प्रताड़ित करना।” कोर्ट ने विशेष रूप से छात्र की मैट्रिक परीक्षा छूटने पर चिंता जताई और पूछा कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? केस डायरी का अवलोकन करते हुए अदालत ने नाराजगी जताई कि छात्र को हिरासत में लेने का स्पष्ट रिकॉर्ड पुलिस ने सही तरीके से दर्ज नहीं किया है।

क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता के अनुसार, 26 जनवरी की रात लावालौंग थाना पुलिस ने रंगदारी के एक मामले में मोबाइल को संदिग्ध बताते हुए छात्र को घर से उठाया था। आरोप है कि पूछताछ के बाद उसे छोड़ने के बजाय 10 दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया। जब परिजनों ने उच्च न्यायालय में ‘हेबियस कॉर्पस’ (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर की, तब आनन-फानन में पुलिस ने छात्र को घर पहुंचाया। याचिकाकर्ता का यह भी आरोप है कि पुलिस अब केस वापस लेने का दबाव बना रही है।

अगली सुनवाई 27 फरवरी को

अदालत ने पुलिस की छवि सुधारने की जरूरत पर बल देते हुए मामले की अगली सुनवाई 27 फरवरी को तय की है। खंडपीठ ने चतरा एसपी को विस्तृत रिपोर्ट के साथ पुनः उपस्थित होने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान चतरा एसपी के अलावा डीएसपी और संबंधित थाना प्रभारी भी अदालत में मौजूद रहे।

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