रांची: ओडिशा के पुरी की तर्ज पर झारखंड की राजधानी रांची के ऐतिहासिक धुर्वा क्षेत्र में आयोजित होने वाला जगन्नाथपुर रथ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि छोटानागपुर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, अटूट आस्था और जनजातीय-सनातनी एकता का जीवंत प्रतीक है। हर वर्ष आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मौसी बाड़ी के लिए रथ पर सवार होकर निकलते हैं। इस पावन अवसर पर आयोजित होने वाला ऐतिहासिक रथ मेला पूरे पूर्वी भारत में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मंदिर का निर्माण
रांची के जगन्नाथपुर मंदिर का इतिहास अत्यंत गौरवशाली है। इस भव्य मंदिर का निर्माण नागवंशी राजा रामशाह के चौथे पुत्र ठाकुर ऐनी नाथ शाहदेव ने 1691 ईस्वी (संवत 1748) में करवाया था। लोककथाओं के अनुसार, ठाकुर ऐनी नाथ शाहदेव पुरी के भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे। एक बार पुरी यात्रा के दौरान भगवान ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर रांची में ही मंदिर निर्माण का आदेश दिया। इसके बाद उन्होंने पुरी के मंदिर की वास्तुकला से प्रेरित होकर एक ऊंची पहाड़ी पर इस मंदिर की स्थापना की। मंदिर के निर्माण के साथ ही यहां रथ यात्रा और मेले की शुरुआत हुई, जो पिछले 330 से अधिक वर्षों से निरंतर चली आ रही है।
मेले का स्वरूप और सांस्कृतिक संगम
रांची का रथ मेला अपने आप में अनूठा है क्योंकि यह झारखंड की जनजातीय संस्कृति और सनातनी परंपराओं के अद्भुत मिलन का गवाह बनता है। मेले में रांची शहर के अलावा खूंटी, गुमला, लोहरदगा, सिमडेगा, रामगढ़ और पुरुलिया (पश्चिम बंगाल) जैसे सुदूर ग्रामीण इलाकों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु और ग्रामीण पहुंचते हैं।
रथ यात्रा के दिन जब महाप्रभु का विशाल रथ आगे बढ़ता है, तो ‘जय जगन्नाथ’ के जयघोष के साथ पारंपरिक मांदर, नगाड़ों और ढोल की थाप से पूरा माहौल गूंज उठता है। ग्रामीण क्षेत्रों से आए लोग पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य करते हुए भगवान के रथ को खींचते हैं। ऐसी मान्यता है कि रथ की रस्सी को छूने मात्र से जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।
आर्थिक और सामाजिक ताना-बाना
रांची का रथ मेला क्षेत्र के छोटे व्यापारियों, शिल्पकारों और किसानों के लिए आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। लगभग एक सप्ताह से अधिक समय तक चलने वाले इस मेले में सैकड़ों की संख्या में दुकानें सजती हैं।
- पारंपरिक हस्तशिल्प और कृषि उपकरण: मेले में ग्रामीण इलाकों से आए कारीगर बांस और लकड़ी से बने पारंपरिक बर्तन, टोकरियां, सूप और खेती-किसानी के औजार (जैसे कुदाल, हल, हंसुआ) बेचते हैं। आधुनिक दौर में भी इन पारंपरिक चीजों की भारी मांग रहती है।
- घरेलू सामान और श्रृंगार: मिट्टी के खिलौने, घरेलू बर्तन, महिलाओं के पारंपरिक आभूषण और सौंदर्य सामग्री की दुकानें महिलाओं और बच्चों के आकर्षण का केंद्र होती हैं।
- मनोरंजन के साधन: बड़े-बड़े झूले, मिकी माउस, जादू के शो और सर्कस मेले में आने वाले बच्चों और युवाओं का भरपूर मनोरंजन करते हैं।
मेले का स्वाद: खाजा और मालपुआ
पुरी की तरह रांची के रथ मेले का भी अपना एक खास जायका है। मेले में विशेष रूप से मिलने वाला ‘खाजा’ (एक प्रकार की पारंपरिक मिठाई) और गरमा-गरम मालपुआ यहां आने वाले हर श्रद्धालु की पहली पसंद होती है। मेले से लौटते समय लोग अपने परिवार और पड़ोसियों के लिए प्रसाद के रूप में खाजा ले जाना कभी नहीं भूलते।
मौसी बाड़ी में नौ दिनों का प्रवास
मुख्य मंदिर से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘मौसी बाड़ी’ में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा नौ दिनों तक विश्राम करते हैं। इन नौ दिनों के दौरान मौसी बाड़ी में विशेष पूजा-अर्चना और छप्पन भोग का आयोजन होता है, जहां दर्शन के लिए हर दिन हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। नौ दिनों के प्रवास के बाद ‘घुरती रथ यात्रा’ (बहुड़ा यात्रा) के दिन भगवान पुनः अपने मुख्य मंदिर लौट आते हैं, जिसके साथ ही इस भव्य मेले का समापन होता है।
आधुनिक चुनौतियां और प्रशासन की भूमिका
समय के साथ मेले का स्वरूप काफी बड़ा और आधुनिक हुआ है। लाखों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए रांची जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन व्यापक स्तर पर सुरक्षा, ट्रैफिक रूट डायवर्जन, सीसीटीवी निगरानी, मेडिकल कैंप और पेयजल की व्यवस्था करता है। मंदिर समिति के स्वयंसेवक भी व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, बदलती जीवनशैली और शहरीकरण के बीच मेले के पारंपरिक और सांस्कृतिक स्वरूप को अक्षुण्ण बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।
रांची का जगन्नाथपुर रथ मेला केवल मनोरंजन या व्यापार का साधन नहीं है, बल्कि यह आपसी भाईचारे, सामाजिक समरसता और श्रद्धा का महापर्व है। यह मेला आधुनिकता की दौड़ में शामिल रांची शहर को उसकी जड़ों और लोक-संस्कृति से जोड़े रखने का एक सशक्त माध्यम है। महाप्रभु जगन्नाथ की यह रथ यात्रा झारखंड की धरा पर सुख, समृद्धि और शांति का संदेश फैलाती है।




