रांची: बौद्धिक दिव्यांगता से जूझ रहे बच्चों की समय पर पहचान और उनके समुचित विकास के लिए रांची स्थित प्रतिष्ठित मानसिक स्वास्थ्य संस्थान RINPAS ने एक अहम पहल की है। इसके क्लिनिकल साइकोलॉजी विभाग की ओर से आईसीएसएसआर मेजर प्रोजेक्ट के सहयोग से जे. ई. धुनजीभॉय एकेडमिक एंड रिसर्च सेंटर में “सर्टिफिकेशन प्रोसेस फॉर इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी” विषय पर एक दिवसीय विशेष वर्कशॉप-सह-कैपेसिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम का आयोजन किया गया।
झारखंड सरकार के स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग द्वारा रांची और खूंटी जिले के सरकारी स्कूलों से नामित 37 स्पेशल एजुकेटर्स, प्रोजेक्ट स्टाफ और वॉलंटियर्स ने इस व्यावहारिक प्रशिक्षण में हिस्सा लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य शिक्षकों को प्रमाणन (सर्टिफिकेशन) और मूल्यांकन की सही प्रक्रिया से लैस करना था, ताकि जरूरतमंद बच्चों को सरकारी योजनाओं और विधिक अधिकारों का सीधा लाभ मिल सके।
कार्यक्रम का उद्घाटन RINPAS की निदेशक डॉ. जयती सिमलाई, क्लिनिकल साइकोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) अमूल रंजन सिंह और विभाग की एडिशनल प्रोफेसर सह प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. मसरूर जहां ने किया।
उद्घाटन संबोधन में डॉ. जयती सिमलाई ने जोर देकर कहा कि बौद्धिक दिव्यांगता के मामलों में शुरुआती स्तर पर पहचान और समय पर सही संस्थान में रेफरल सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। जब शिक्षक स्कूल स्तर पर ही बच्चे के मानसिक विकास में आ रही रुकावटों को पहचान लेते हैं, तो बच्चे का जीवन संवारना आसान हो जाता है। इसके बाद डॉ. मसरूर जहां ने कार्यशाला की रूपरेखा साझा करते हुए स्पेशल एजुकेटर्स की भूमिका पर रोशनी डाली।
तकनीकी सत्रों में विषय विशेषज्ञों ने कानूनी, चिकित्सीय और सामाजिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की:
- प्रो. (डॉ.) अमूल रंजन सिंह ने एक जीवंत और संवादात्मक सत्र के माध्यम से दिव्यांगता प्रमाणन की पात्रता, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन पद्धतियों और अनिवार्य दस्तावेजों की बारीकियों को स्पष्ट किया।
- डॉ. मसरूर जहां ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act) के तहत तय मानकों और परिभाषाओं की कानूनी समझ साझा की।
- डॉ. अनुराधा वत्स (क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट एवं स्टेट कोऑर्डिनेटर, नेशनल ट्रस्ट/दीपशिखा) ने बौद्धिक अक्षमता से प्रभावित व्यक्तियों के लिए केंद्र व राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं, पेंशन, छात्रवृत्ति और अधिकारों पर विस्तृत जानकारी दी।
सत्र के दौरान शिक्षकों ने फील्ड में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों, अभिभावकों की हिचक और मदद मांगने के मार्गों (Help Seeking Pathways) पर खुलकर विचार रखे। समापन पर एक गहन प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित हुआ, जिसमें विशेषज्ञों ने शिक्षकों की सभी शंकाओं का समाधान किया। अंत में सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।






