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जिस थाने के इंचार्ज पर खुद दर्ज है एफआईआर, वहां निष्पक्ष जांच कैसे संभव?

निशा भगत प्रकरण: आरोपी ही थानेदार, प्राकृतिक न्याय का हनन, सुप्रीम कोर्ट की नज़ीरें और थानेदार को तत्काल पदमुक्त कर फास्ट-ट्रैक ट्रायल की विधिक अनिवार्यता

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रांची/पिठोरिया: आदिवासी नेत्री निशा भगत की संदिग्ध मौत के मामले ने झारखंड की कानून-व्यवस्था और पुलिसिया कार्यप्रणाली के उस विरोधाभासी पहलू को सतह पर ला खड़ा किया है, जहां कानून के बुनियादी सिद्धांतों का खुला मखौल उड़ता दिख रहा है। मृतका के पिता हांदु भगत की लिखित तहरीर पर पिठोरिया थाने में थाना प्रभारी सतीश कुमार पांडेय, अजय तिर्की, ज्योत्सना केरकेट्टा और जमीन दलालों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है।
परंतु, इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला और गंभीर कानूनी पेच यह है कि जिस अधिकारी सतीश कुमार पांडेय पर आत्महत्या के लिए विवश करने, प्रताड़ित करने और साजिश में शामिल होने का सीधा आरोप है, वह आज भी उसी पिठोरिया थाने की कुर्सी पर बतौर थाना प्रभारी आसीन है। इस विसंगति ने न केवल मृतका के परिजनों बल्कि आम जनता के मन में यह आशंका पैदा कर दी है कि जब आरोपी स्वयं थाने का प्रशासनिक मुखिया बना रहेगा, तो क्या साक्ष्यों की सुरक्षा संभव है?

1. प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का खुला हनन: ‘नेमो जुडेक्स इन कॉउसा सुआ’

विधि शास्त्र का सर्वमान्य और शाश्वत सिद्धांत है:
“Nemo Judex In Causa Sua” अर्थात कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश, जांचकर्ता या निर्धारक नहीं हो सकता।
जब किसी थाने के प्रभारी पर ही भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सुसंगत धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज हो जाए, तो उसी थाने के किसी अधीनस्थ दारोगा या सब-इंस्पेक्टर द्वारा उस केस की जांच करना निष्पक्षता के हर पैमाने को ध्वस्त करता है। 
इधर, ज्ञात सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार यहां चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे मामले में Dy. SP अमर कुमार पाण्डेय को जांच अधिकारी बनाया गया है यानी वे इस पूरे मामले की जांच करेंगे। स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि Dy. SP अमर कुमार पाण्डेय, थाना प्रभारी सतीश कुमार पांडेय के काफी करीबी हैं और उनके संरक्षण में ही पिठोरिया थाना प्रभारी अपने अधीनस्थ थाना के मामलों को लेकर गंभीरता नहीं दिखाते और लीपापोती करते हैं।
ऐसे में जांच की दिशा सही होगी और थाना प्रभारी को बचाने का प्रयास नहीं किया जायेगा, इसकी संभावना कम ही है। इसलिए ग्रामीणों ने वरीय पुलिस अधिकारियों से जांच अधिकारी किसी और को बनाने का आग्रह किया है ताकि जांच निष्पक्ष हो और दोषियों की पहचान हो सके और उनके विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई की जा सके। 

अधीनस्थ पुलिसकर्मी पदानुक्रम (Hierarchy) में अपने ही थानेदार के अधीन काम करते हैं। ऐसे में:

  • जीडी (जनरल डायरी) एंट्री और स्टेशन रिकॉर्ड्स में फेरबदल की सीधी संभावना बनी रहती है।
  • पीड़िता निशा भगत द्वारा मृत्यु से पूर्व दिए गए बयानों, थाने में आए पूर्व आवेदनों और कॉल डिटेल्स से जुड़े महत्वपूर्ण अभिलेखों के साथ छेड़छाड़ या उन्हें नष्ट किए जाने का गंभीर जोखिम उत्पन्न होता है।
  • स्थानीय गवाहों पर दबाव बनाने या उन्हें धमकाए जाने की पूरी आशंका रहती है।

2. सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के स्थापित न्यायिक सिद्धांतों का उल्लंघन

उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि जांच केवल निष्पक्ष होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि जनता की नजर में निष्पक्ष दिखनी भी चाहिए (Justice must not only be done, but must also be seen to be done):
  1. बाबूभाई बनाम गुजरात राज्य (2010) 12 SCC 254: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष जांच (Fair Investigation) और निष्पक्ष विचारण (Fair Trial) हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। यदि जांच अधिकारी या जांच का दायरा पक्षपातपूर्ण, पूर्वाग्रहयुक्त या आरोपी के प्रभाव में दिखता है, तो पूरी प्रक्रिया दूषित मानी जाएगी।
  2. मेघा सिंह बनाम हरियाणा राज्य (1996) और मुकेश सिंह बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली 2020): अदालतों ने यह रेखांकित किया है कि जहां पुलिस अधिकारी की खुद की संलिप्तता या उसका व्यक्तिगत हित सीधे तौर पर जुड़ा हो, वहां उस अधिकारी का थाने के नियंत्रण में बने रहना जांच की निष्पक्षता पर सीधा आघात करता है।
  3. आर.एस. सोढ़ी बनाम पंजाब राज्य (AIR 1991 SC 1307) एवं स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (2010): शीर्ष अदालत ने यह नजीर स्थापित की है कि जब राज्य पुलिस या स्थानीय थाने के वरिष्ठ अधिकारियों पर ही गंभीर आपराधिक आरोप लगे हों, तो स्थानीय पुलिस के प्रभाव को समाप्त करने के लिए जांच को किसी निष्पक्ष व स्वतंत्र एजेंसी (जैसे सीआईडी या सीबीआई) को सौंपना विधिक रूप से आवश्यक हो जाता है।

3. सत्ता और पद के दुरुपयोग की आशंका: तुरंत निलंबन क्यों जरूरी?

पिता हांदु भगत ने प्राथमिकी में साफ कहा है कि निशा भगत को झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी दी जाती थी और पिठोरिया थानेदार सतीश कुमार पांडेय इस प्रताड़ना में शामिल थे। इसके अतिरिक्त, निशा भगत ने मरने से पहले सोशल मीडिया पर लाइव आकर पुलिस तंत्र की उपेक्षा और प्रताड़ना की बात कही थी।

ऐसे में थाना प्रभारी को तत्काल प्रभाव से हटाए जाने के पक्ष में ठोस कानूनी आधार हैं:

  • साक्ष्यों को नष्ट होने से बचाना: थानेदार के पास केस डायरी, वायरलेस संदेश और डिजिटल लॉग तक पहुंच होती है। यदि वे पद पर बने रहते हैं, तो इलेक्ट्रॉनिक और दस्तावेजी साक्ष्यों को आसानी से प्रभावित किया जा सकता है।
  • गवाहों का संरक्षण: थाने के अधीनस्थ पुलिसकर्मी और स्थानीय ग्रामीण थानेदार के पद के प्रभाव और रसूख के कारण सच बोलने से कतरा सकते हैं।
  • लोक सेवक आचरण नियमावली (Police Service Conduct Rules): किसी भी पुलिस अधिकारी पर गंभीर संज्ञेय अपराध (जैसे हत्या की साजिश या आत्महत्या के लिए विवश करना) में नामजद एफआईआर दर्ज होने की स्थिति में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए उसे तत्काल निलंबित (Suspend) किया जाना या कम से कम लाइन हाजिर/स्थानांतरित करना अनिवार्य प्रशासनिक प्रक्रिया है।

4. नेताओं और आयोगों की मांग: राजनीतिक रसूख पर चोट

इस विधिक विफलता को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखा आक्रोश फैल चुका है:
  • बाबूलाल मरांडी (नेता प्रतिपक्ष): गुमला में पीड़ित परिवार से मिलकर मरांडी ने कहा कि राज्य में माफियाओं का समानांतर तंत्र चल रहा है और पिठोरिया थाना के दारोगा को तुरंत गिरफ्तार कर पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच कराई जानी चाहिए।
  • समीर उरांव: पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष (एसटी मोर्चा) ने कहा कि निशा भगत निडर होकर सामाजिक मुद्दों पर लड़ती थीं। उन्होंने वीडियो जारी कर सुरक्षा मांगी थी, लेकिन थानेदार ने कोई कदम नहीं उठाया। यह कर्तव्यहीनता और मिलीभगत का चरम है।
  • गीता कोड़ा: उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय महिला आयोग के संज्ञान के बाद यह जरूरी हो गया है कि थानेदार की जवाबदेही तय हो और विभागीय स्तर पर कठोरतम कार्रवाई की जाए।
  • राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग: आयोग की सदस्य डॉ. आशा लकड़ा ने सरकार से जवाब तलब किया है, जिससे यह साफ होता है कि मामला अब सीधे संवैधानिक उल्लंघन का रूप ले चुका है।

5. पीड़ित परिवार को न्याय की राह: फास्ट-ट्रैक कोर्ट और स्वतंत्र एजेंसी की दरकार

निशा भगत के परिजनों का पुलिस व्यवस्था से भरोसा उठ चुका है। न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों और संविधान के अनुच्छेद 14 व 21 की रक्षा के लिए निम्नलिखित विधिक कदम तुरंत उठाए जाने चाहिए:
  1. किसी भी थाने या प्रभाव वाले पद से दूर रखा जाए:सतीश कुमार पांडेय को थाने की कमान से तत्काल हटाकर निलंबित किया जाए। जब तक विभागीय और आपराधिक जांच पूरी न हो, उन्हें किसी भी थाने या प्रभाव वाले पद से दूर रखा जाए।
  2. जांच का स्वतंत्र एजेंसी (CID/CBI) को हस्तांतरण: निष्पक्षता के लिए जांच पिठोरिया थाने से छीनकर किसी स्वतंत्र व वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की एसआईटी (SIT) या सीबीआई को सौंपी जाए।
  3. फास्ट-ट्रैक कोर्ट (Fast Track Special Court) में दिन-प्रतिदिन (Day-to-Day) सुनवाई: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत मामले की समयबद्ध जांच पूरी कर चालान पेश किया जाए और फास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालय में स्पीडी ट्रायल चलाकर दोषियों को कठोर सजा दिलाई जाए, ताकि भविष्य में कोई भी वर्दीधारी अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर किसी बेटी को जान देने पर मजबूर न कर सके।
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