फॉण्ट कनवर्टर NEW

Advertisement
Advertisement

10 मिनट में ग्लास स्किन का दावा कितना सही? रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा

कोरियाई स्किनकेयर के लोकप्रिय ट्रेंड ‘ग्लास स्किन’ से जुड़े सोशल मीडिया दावों पर एक अध्ययन ने सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, टिकटॉक के करीब 95 प्रतिशत संबंधित वीडियो में कम से कम एक गलत या भ्रामक दावा पाया गया।

अपनी भाषा में पढ़ें

Advertisement

Seoul, South Korea: पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया पर ‘ग्लास स्किन’ एक बहुत बड़ा ब्यूटी ट्रेंड बन चुका है। ‘ग्लास स्किन’ का मतलब ऐसी त्वचा से है जो बेहद चिकनी, साफ, हाइड्रेटेड और कांच जैसी चमकदार नजर आए। कोरियाई स्किनकेयर और के-ब्यूटी की लोकप्रियता के साथ यह ट्रेंड भारत सहित दुनिया भर के कई देशों में तेजी से फैला है। हालांकि, अब इस ट्रेंड से जुड़े सोशल मीडिया दावों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

ग्लास स्किन ट्रेंड और सोशल मीडिया दावों की सच्चाई

एक हालिया स्टडी के अनुसार, कोरियाई स्किनकेयर और ग्लास स्किन से जुड़े करीब 95 फीसदी टिकटॉक वीडियो में कम से कम एक दावा गलत या पूरी तरह भ्रामक पाया गया है। अध्ययन के मुताबिक, लगभग 32 फीसदी वीडियो में त्वचा पर बहुत तेजी से या तुरंत असर होने का दावा किया गया। इनमें से कुछ वीडियो में तो केवल 10 मिनट के भीतर ग्लास स्किन पाने जैसी असंभव बातें भी कही गईं।

खास बात यह है कि इन वीडियो में किसी भी बाहरी या विश्वसनीय वैज्ञानिक स्रोत का हवाला नहीं दिया गया था। इस अध्ययन में यह भी सामने आया कि इनमें से करीब 82 फीसदी वीडियो इन्फ्लुएंसर्स द्वारा और 11 फीसदी वीडियो ब्यूटी ब्रांडों की ओर से बनाए गए थे।

‘ग्लास स्किन’ का इतिहास और भारतीय संदर्भ

ग्लास स्किन की अवधारणा को समझने के लिए इसके इतिहास को देखना जरूरी है। कोरियाई सौंदर्य संस्कृति में साफ, चिकनी और चमकदार त्वचा को लंबे समय से महत्व दिया जाता रहा है। हालांकि, आधुनिक ‘ग्लास स्किन’ शब्द को 2010 के दशक में के-ब्यूटी के वैश्विक विस्तार के साथ लोकप्रियता मिली। वर्ष 2017 के आसपास सोशल मीडिया पर स्किनकेयर रूटीन से जुड़े कंटेंट ने इसे एक बड़ा ग्लोबल ट्रेंड बना दिया।

दूसरी ओर, भारत में भी त्वचा की देखभाल और सौंदर्य की एक समृद्ध परंपरा रही है। आयुर्वेद और घरेलू परंपराओं में हल्दी, चंदन, बेसन, नीम, गुलाबजल और उबटन जैसी प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है। हालांकि, भारतीय संदर्भ में त्वचा की रंगत और बनावट को लेकर कोई एक मानक तय करना उचित नहीं माना जा सकता, क्योंकि हर व्यक्ति की त्वचा की प्रकृति अलग होती है।

विशेषज्ञों की सलाह और सोशल मीडिया का सच

विशेषज्ञों से जुड़े इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि सोशल मीडिया के वीडियो को देखकर किसी एक उत्पाद या स्किनकेयर रूटीन से हर व्यक्ति के लिए एक जैसी चमकदार त्वचा पाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। ऑनलाइन वीडियो में दिखाई देने वाली त्वचा पर अच्छी लाइटिंग, कैमरा एंगल और अन्य विजुअल इफेक्ट्स का भी बड़ा असर हो सकता है।

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now
Facebook
X
Threads
WhatsApp
Telegram