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विरासत से नवाचार तक, डॉ. संध्या पुरेचा ने बताया भारतीय कला का भविष्य

Bokaro news: भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करने वाली प्रदर्शन कलाओं (संगीत, नृत्य और नाटक) की सर्वोच्च राष्ट्रीय संस्था संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष, कालिदास सम्मान व संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात भरतनाट्यम नृत्यांगना, कोरियोग्राफर तथा लेखिका डॉ. संध्या पुरेचा

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Bokaro news: भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करने वाली प्रदर्शन कलाओं (संगीत, नृत्य और नाटक) की सर्वोच्च राष्ट्रीय संस्था संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष, कालिदास सम्मान व संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात भरतनाट्यम नृत्यांगना, कोरियोग्राफर तथा लेखिका डॉ. संध्या पुरेचा ने भारत की सांस्कृतिक विरासत के भविष्य को लेकर एक दूरदर्शी और प्रभावी रूपरेखा प्रस्तुत की है, जिसे उन्होंने साधना का नाम दिया है। जीडब्ल्यू 20 की अध्यक्षा रह चुकीं डॉ. पुरेचा ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम मीट द आर्टिस्ट के अनुभवों के आधार पर कला जगत की चुनौतियों और कला नीति पर अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय संस्कृति की वास्तविक शक्ति केवल उसके अतीत में नहीं, बल्कि वर्तमान में उसके जीवंत बने रहने और भविष्य के लिए उसकी प्रासंगिकता में निहित है।

डॉ. पुरेचा के अनुसार, साधना की यह रूपरेखा 5 प्रमुख स्तंभों पर आधारित है, जिसमें जीवंत विरासत का संरक्षण (एस), गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से शिक्षण (ए), शास्त्र और व्यवहार का संवाद (डी), विरासत-आधारित नवाचार (एच) तथा राष्ट्रीय पहचान व सॉफ्ट पावर के रूप में कलाएं (ए) शामिल हैं। उन्होंने बताया कि संगीत नाटक अकादमी छऊ और कुटियाट्टम जैसी लुप्तप्राय विधाओं में विशेष प्रशिक्षण देकर नई पीढ़ी को तैयार कर रही है। परंपरा और नवाचार को एक-दूसरे का पूरक बताते हुए उन्होंने कहा कि जड़ों से जुड़ा बदलाव ही कला को दीर्घायु बनाता है।

आज के वैश्विक युग में कला को देश की सॉफ्ट पावर बताते हुए डॉ. पुरेचा ने अकादेमी की ऐतिहासिक उपलब्धियों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि अक्टूबर 2024 में आयोजित अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य संगोष्ठी और जनवरी 2025 के गणतंत्र दिवस समारोह में प्रस्तुत जयति जय मम भारतम् इसके जीवंत उदाहरण हैं। इस भव्य प्रस्तुति में देश भर के 5000 से अधिक लोक एवं जनजातीय कलाकारों ने भाग लिया था, जिसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा लार्जेस्ट इंडियन फोक वैरायटी डांस के रूप में वैश्विक मान्यता प्राप्त हुई। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक संरक्षण केवल संस्थाओं के भरोसे संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए कलाकारों, शिक्षकों, नीति-निर्माताओं और दर्शकों को मिलकर सामूहिक साधना करनी होगी।

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