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शिबू सोरेन पर उर्दू की पहली शोधपरक पुस्तक स्वास्थ्य मंत्री को भेंट

Ranchi News : झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन के सदस्य डॉ. जमाल अहमद ने 28 नवंबर 2025 को स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफ़ान अंसारी से मुलाकात कर अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक “बाबा ए झारखंड शिबू सोरेन” भेंट की। यह पुस्तक सिर्फ साहित्यिक योगदान नहीं, बल्कि झारखंड की राजनीतिक,

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Ranchi News : झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन के सदस्य डॉ. जमाल अहमद ने 28 नवंबर 2025 को स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफ़ान अंसारी से मुलाकात कर अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक “बाबा ए झारखंड शिबू सोरेन” भेंट की। यह पुस्तक सिर्फ साहित्यिक योगदान नहीं, बल्कि झारखंड की राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक यात्रा का एक विस्तृत व प्रमाणिक दस्तावेज मानी जा रही है। खास बात यह है कि शिबू सोरेन के जीवन और उनके संघर्ष पर उर्दू भाषा में यह पहली व्यापक शोधपरक पुस्तक है, जिसे साहित्यिक जगत में विशेष सराहना मिल रही है।

पुस्तक को और विशेष बनाता है इसमें शामिल स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफ़ान अंसारी का लेख “कॉरपोरेट घरानों को ललकारने वाले शिबू सोरेन” अपने लेख में उन्होंने लिखा है कि यदि शिबू सोरेन जैसे साहसी और दूरदर्शी नेता न होते, तो झारखंड के आदिवासी एवं मूलवासी समुदाय कॉरपोरेट प्रभाव में अपने बुनियादी अधिकारों से वंचित हो जाते। आज जिस जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा की चेतना झारखंड में दिखाई देती है, वह शिबू सोरेन की वर्षों लंबी लड़ाई व उनकी स्पष्ट नीतियों का परिणाम है।

झारखंड की धरती सदियों से कोयला, लोहा, बॉक्साइट सहित कई बहुमूल्य खनिजों से समृद्ध रही है, लेकिन इसी संपदा ने इसे कॉरपोरेट हितों का केंद्र बना दिया। खनन और उद्योगों के विस्तार के नाम पर हजारों आदिवासी परिवारों को अपनी जमीन, पहचान और जीवनशैली से बेदखल किया गया। जहाँ उद्योग और पूंजी बढ़ी, वहीं स्थानीय समुदाय अपने ही घर में हाशिए पर चला गया।

खनन कार्यों ने जंगलों को नष्ट किया और कृषि भूमि की उर्वरता को नुकसान पहुंचाया। पहाड़ों की कटाई ने पर्यावरणीय संतुलन को गहरा आघात दिया। मजदूरों को सुरक्षा, उचित वेतन और अधिकारों से जुड़ी समस्याओं से भी लगातार जूझना पड़ा।

इस कठिन दौर में शिबू सोरेन का संघर्ष सिर्फ राजनीतिक नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय और आदिवासी पहचान के संरक्षण की ऐतिहासिक लड़ाई बन गया। इसी कारण डॉ. जमाल अहमद की यह पुस्तक आदिवासी आंदोलन, झारखंड की अस्मिता और जनसंघर्ष की महत्वपूर्ण धरोहर के रूप में देखी जा रही है।

साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पाठकों ने इसे झारखंड आंदोलन के इतिहास को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान बताया है। पुस्तक की बढ़ती लोकप्रियता और शिबू सोरेन की ऐतिहासिक भूमिका को देखते हुए यह मांग ज़ोर पकड़ रही है कि भारत सरकार उन्हें “भारत रत्न” से सम्मानित करे, ताकि उनके संघर्ष, योगदान और नेतृत्व का राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान हो सके।

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